पोलावरम परियोजना के खिलाफ अदालत जाएगा उड़ीसा
राज्य के जल संसाधन सचिव एस.सी.महापात्रा ने आईएएनएस को बताया, "हम एक-दो दिन के भीतर सर्वोच्च न्यायालय में इस परियोजना को दी गई वन मंजूरी को रद्द करने के लिए एक याचिका दायर करेंगे, क्योंकि इस परियोजना के कारण उड़ीसा के मलकानगिरि जिले में कई गांव पानी में डूब जाएंगे।"
मंत्रालय ने पिछले महीने इस परियोजना को यह कहते हुए मंजूरी दे दी थी कि उड़ीसा का कोई क्षेत्र नहीं डूबेगा, क्योंकि आंध्र प्रदेश सरकार उड़ीसा में संभावित बाढ़ को रोकने के लिए राज्य की सीमा पर एक दीवार खड़ी करेगी।
महापात्रा ने कहा, "उन्होंने यह विचार करते हुए निर्णय लिया कि केवल 10 गांव डूबेंगे। लेकिन यह सच नहीं है। हमारे राज्य के और अधिक गांव डूब से प्रभावित होंगे।"
महापात्रा ने कहा, "अभी तक उड़ीसा में इसके प्रभाव का कोई आकलन नहीं किया गया। इसी तरह परियोजना से प्रभावित होने वाले गांवों में कोई जन सुनवाई भी नहीं आयोजित की गई।"
उड़ीसा सरकार, मंत्रालय द्वारा 2008 में दी गई अंतरिम मंजूरी के बाद ही सर्वोच्च न्यायालय गई थी। महापात्रा ने कहा, "जब मामला अभी अदालत में लंबित है, तो हमें इस बात पर आश्चर्य होता है कि मंत्रालय ने अंतिम मंजूरी कैसे दे दी।"
उन्होंने कहा कि परियोजना से प्रभावित होने वाले उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के लोगों से मशविरा किए बगैर जिस तरीके से मंजूरी दी गई, राज्य सरकार उससे भी नाखुश है।
महापात्रा ने कहा कि मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पर्यावरण एवं वन मंत्री जयराम रमेश को इस महीने के प्रारंभ में पत्र लिख कर परियोजना को दी गई मंजूरी वापस लेने की मांग की थी।
माहापत्रा ने कहा कि उन्होंने खुद पर्यावरण एवं वन सचिव को पत्र लिखा था।
आंध्र प्रदेश सरकार का कहना है कि 10,150 करोड़ रुपये लागत वाली यह परियोजना 28.50 लोगों को पेय जल उपलब्ध कराएगी, 960 मेगावाट बिजली पैदा करेगी और उद्योगों को 2,350 करोड़ घन फुट पानी उपलब्ध कराएगी।
दूसरी ओर छत्तीसगढ़ और उड़ीसा को इस बात का डर है कि परियोजना पूरी हो जाने के बाद यदि बाढ़ आती है तो गोदावरी नदी की सहायक नदियों -सबेरी और सिलेरू - में बाढ़ आ सकती है और परिणामस्वरूप उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के दर्जनों गांव डूब जाएंगे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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