'लेकिन सरकार को तरस नहीं आया'

'लेकिन सरकार को तरस नहीं आया'

ग़ज़नफ़र अब्बास

बीबीसी उर्दू डॉटकॉम, रहीमयार ख़ान से

मौजूदा बाढ़ में जहां दक्षिणी पंजाब के लाखों लोग बेघर हुए हैं उनमें हज़ारों अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के लोग भी शामिल हैं.

ये लोग पाकिस्तान के सबसे बड़े राज्य पंजाब के दक्षिणी ज़िले रहीमयार ख़ान में बसे हुए हैं. सिंधु नदी में आने वाले उफ़ान से प्रभावित होने वाला हिंदू समुदाय काफ़ी परेशान है.

रहिमयार ख़ान ज़िले के हिंदुओं ने अब सादिक़ाबाद की बस्ती कृष्ण नगर में पनाह ली है. ढाई से तीन हज़ार की आबादी वाली इस बस्ती में सैकड़ों बाढ़ पीड़ित भी मौजूद हैं.

बाढ़ की वजह से भंग शरीफ़, कोट संजर ख़ान, मियनी, दवाई कोट सबज़ल, बांदी, ख़ालती, और दूसरे छोटे बड़े गांवों में लगभग 15 हज़ार हिंदू बेघर हो गए हैं.

मेरी मुलाक़ात कालूजी नामक एक युवक से हुई जिसके बदन पर गीली मिट्टी लगी हुई थी और वह मेहतन-मज़दूरी करके लौटा था. उसने अपनी दास्तान कुछ इस तरह सुनाई:

"साईं, हमारे मवेशी मर गए हैं और मकान भी गिर गया है. अब छोटे-छोटे बच्चों को लेकर किधर जाएं. हम तीन भाई हैं और तीनों के सात-सात आठ-आठ बच्चे हैं. हमारी मदद किसी ने नहीं की. हम मेहनत मज़दूरी करके अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं."

वहां मौजूद ज़िला परिषद के पूर्व सदस्य कांजी राम ने कहा, "कितने दुख की बात है कि पाकिस्तान सरकार ने यहां की हिंदू अल्पसंख्यक बिरादरी के साथ बहुत बुरा सलूक किया है. किसी ने आकर ये तक न पूछा कि आप लोग किस मुश्किल में हो."

कृष्ण नगर के पार्षद डनू राम ने कहा, "जब भंग में सैलाब आया तो अपने रिश्तेदारों को अपने साथ ले आए. ये लोग अपना कुछ सामान लाए और कुछ वहीं छोड़ आए, हम भी इन्हीं की तरह दिहाड़ी करने वाले हैं, इसलिए बमुश्किल अपने बच्चों का पेट काट कर अपने इन बेघर रिश्तेदारों का साथ दे रहे हैं."

कृष्ण मंदिर में अभी उन बाढ़ पीड़ितों से बात हो ही रही थी कि दो लोग एक देग लिए वहां आ गए और कहा मेहमानों को कह दो कि लंगर ले जाएं. मेहमानों से उनका मतलब बाढ़ पीड़ित थे.

उन दो लोगों में से एक पूर्व तहसील सदस्य मेहरान दास का कहना था, "ये बेचारे अपनी मदद आप के तहत अपने रिश्तेदारों के यहां ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. हम नेता लोग ज़बाना जमा ख़र्च के अलावा कुछ भी नहीं कर रहे हैं. न हिंदू न मुसलमान."

प्रीतम दास का कहना था कि हम इस इलाक़े के वास्तविक और सबसे पुराने निवासी हैं और हमने बंटवारे के वक़्त भी अपनी जन्मभूमि को नहीं छोड़ा. लेकिन जब हम पर ये कड़ा वक़्त बाढ़ की सूरत में आया है और हमारे लोग प्रभावित हुए हैं और हमारे देश वाले हमें क्यों छोड़ रहे हैं?

उसके बाद जब कुसंबी माई के घर गया तो उन्होंने बताया कि उनके घर में बाढ़ पीड़ित चार परिवार हैं. यहां रहने वाले सनम का कहना था, "हमारा सब कुछ डूब चुका है, बर्तन थे, कपड़े थे, बिस्तर थे.... हम अपना सांस लेकर इधर भाग आए हैं. हमारे बच्चे भूखे हैं किसी टैम खाते हैं और किसी टैम उन्हें कुछ नहीं मिलता."

माई कुसंबी का कहना था कि उन्होने भूखे रह कर अपने बच्चों का पेट भरा है 'क्योंकि ये मुसाफ़िर हैं हमने तरस किया लेकिन सरकार ने नहीं.'

जब उनसे पूछा गया गया कि आख़िर वह कितने दिन उनकी सेवा-ख़ातिर करेंगी तो उनका कहना था कि जबतक वे अपने घर को वापस नहीं चले जाते अपने बच्चों का पेट काट कर खिलाती रहूंगी.

कृष्ण नगर की कुसंबी माई की बात सुनकर ये लगा कि ज़िंदगी अभी ज़िंदगी से मायूस नहीं हुई है और देश के दूसरे हिस्से की तरह यहां के लोग भी एक दूसरे के दुख दर्द में बराबर के शरीक हैं.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+