'मध्यस्थता प्रक्रिया मुकदमों के सौहार्दपूर्ण समाधान में सहायक'

शिमला, 21 अगस्त (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष अल्तमस कबीर ने कहा कि न्यायालयों में लंबित पड़े मामले कम करने के लिए 'मध्यस्थता' जैसी वैकल्पिक विवाद निवारण प्रक्रिया वर्तमान समय की मांग है।

वह शनिवार को हिमाचल प्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और उच्च न्यायालय की मध्यस्थता समिति द्वारा यहां 'मीडिएशन एवं रेफरल जजिस और मीडिएटर्स' विषय पर आयोजित एक दिवसीय कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे थे।

कबीर ने कहा कि मध्यस्थता न्यायिक मामलों में समझौते की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कोई तीसरा व्यक्ति विशेष संचार एवं समझौता तकनीकों के माध्यम से दो पक्षों के बीच विवाद सुलझाने में सहयोग करता है।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार की प्रक्रिया में दोनों पक्षों को यह अधिकार होता है कि वह मध्यस्थता करने वाले व्यक्ति के माध्यम से अपना विवाद स्वयं सुलझाएं। साथ ही दोनों पक्षों को यह भी स्वतंत्रता होती है कि वे न्यायिक अधिकारों एवं दायित्वों को नजरंदाज कर परस्पर समाधान के लिए सहमत हो जाएं।

कबीर ने कहा कि मध्यस्थता के कारण बहुमूल्य समय, ऊर्जा और धन की बचत होती है। दोनों पक्षों को परेशानी से बचाने के साथ-साथ यह प्रक्रिया दीर्घावधि से चल रही मुकदमेबाजी के शीघ्र समाधान में भी सहायता करती है।

उन्होंने कहा कि सभी उच्च न्यायालयों में मध्यस्थता केंद्र स्थापित किए गए हैं, ताकि विवादों के शीघ्र निपटारे में लोगों को सुविधा मिल सके।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश एवं सर्वोच्च न्यायालय विधिक सेवा समिति के अध्यक्ष न्यायाधीश आऱ बी़ रविंद्रन ने कहा कि यद्यपि धारा-89 का प्रावधान किया गया है, लेकिन इसे समुचित तरीके से लागू नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि लंबित मामलों को कम करने के लिए वैकल्पिक न्यायिक व्यवस्था की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि लोक अदालतों से भी लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे की सुविधा मिली है। कई न्यायालयों ने विलंब से बचने और समय एवं धन की बचत के लिए मध्यस्थता प्रक्रिया को अपनाया है। मध्यस्थता केंद्रों के कारण विवादियों को व्यक्तिगत और व्यावसायिक संबंध सुधारने के साथ-साथ तनाव व परेशानी कम करने में भी सहायता मिली है।

प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने कहा कि वर्तमान में प्रदेश उच्च न्यायालय में 45 हजार मामले लंबित पड़े हैं, जबकि अधीनस्थ 106 न्यायालयों में यह संख्या 1़ 57 लाख तक पहुंच गई है।

उन्होंने कहा कि आगामी कुछ वर्षो में लंबित मामलों में कमी लाकर हिमाचल उच्च न्यायालय को देश के श्रेष्ठ न्यायालयों की श्रेणी में लाया जाएगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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