नई भू-अधिग्रहण नीति की ज़रुरत

नई भू-अधिग्रहण नीति की ज़रुरत

रामदत्त त्रिपाठी

बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

अलीगढ़ में किसानों के ताज़ा संघर्ष ने अंग्रेजों के लगभग सवा सौ साल पहले बनाए गए भू-अधिग्रहण क़ानून और केंद्र तथा राज्य सरकारों की राहत एवं पुनर्वास नीति की खामियों को फिर से नये सन्दर्भ में उजागर कर दिया है.

पुलिस फायरिंग में किसानों की मौत के बाद राजनीतिक दल फौरी तौर पर इस मुद्दे से जुड़ गए हैं, लेकिन किसी पार्टी के पास भू-अधिग्रहण के बारे में कोई सुविचारित नीति नहीं है, उलटे यह मुद्दा उठाने वाले सभी दल सत्तासीन होने पर लगभग वैसी ही नीति पर चलते रहे हैं जैसी कि मायावती चल रही हैं.

विपक्षी दल के एक विधायक ने हाल ही में विधान सभा में यह सवाल उठाया था कि इस समय उत्तर प्रदेश में मायावती सरकार ने जितने एक्सप्रेस-वे प्रस्तावित किये हैं , उनमे क़रीब 23 हजार गाँव प्रभावित होंगे. अगर शहरी विकास की दूसरी परियोजनाएँ जोड़ दी जाएँ तो यह संख्या 25 हजार पार कर जाएगी. मतलब उत्तर प्रदेश के लगभग एक चौथाई गाँव उजड़ जाएँगे और उनकी आबादी विस्थापित हो जाएगी.

लेकिन इतनी बड़ी ज़मीनों पर जो एक्सप्रेस-वे सड़कें, हाईटेक शहर , कालोनियां , हवाई अड्डे आदि बनेंगे उनका फ़ायदा इन विस्थापित लोगों को शायद ही मिले.

बड़ी कंपनियाँ इन परियोजनाओं से जो मुनाफ़ा कमाएंगीं उनमें इन विस्थापित लोगों की कोई हिस्सेदारी नहीं होगी. गाँवों के इन छोटे किसानों और खेत मजदूरों के पास रोज़ी-रोटी और मकान की वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं होगी.

राजनीतिक दल और शासन प्रशासन चूँकि इन परियोजनाओं से प्रभावित लोगों के दिलोदिमाग में उठने वाले इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं देते इसलिए असहाय और असंगठित किसान जहां-तहां धरना प्रदर्शन और आंदोलन करते हैं और पुलिस से टकरा जाते हैं क्योंकि सरकार और कंपनी वाले ख़ुद पीछे रहकर पुलिस को आगे कर देते हैं.

तभी नंदीग्राम एवं सिंगूर की तरह अलीगढ़ के टप्पल, मथुरा के बाजना, और आगरा के चौगान गाँव भी सुर्ख़ियों में आ जाते हैं.

एक स्थानीय अधिकारी ने बताया कि अगर शनिवार की शाम को लखनऊ में बैठे अफसरों ने अलीगढ के किसान नेता रामबाबू को गिरफ्तार करने का हुक्म न दिया होता तो वहाँ हिंसक संघर्ष की नौबत ही नहीं आती.

इसी तरह मामला बढ़ने पर सरकार के एक मंत्री और आला अफसरों ने राम बाबू को पुलिस हिरासत में आधी रात जेल से गेस्ट हाउस लाकर मीडिया के सामने समझौते का ऐलान करा दिया.

रामबाबू को यह मौक़ा भी नहीं दिया कि वह दिन के उजाले में अपने साथी किसानों और गाँव वालों से विचार विमर्श कर सकें. परिणाम यह हुआ कि किसानों ने रामबाबू पर विश्वास खो दिया और बढ़ा हुआ मुआवज़ा भी ठुकरा दिया.

1894 में भू-अधिग्रहण क़ानून मुख्य रुप से रेल, सड़क, हवाई अड्डा, सेना, पुलिस अथवा अन्य सरकारी एवं सार्वजनिक कल्याणकारी उद्देश्य की परियोजनाओं और उनसे विस्थापित होने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए बनाया गया था.

इसी क़ानून के ज़रिए सरकार किसी कंपनी अथवा सोसायटी आदि के लिए ज़मीन भी उपलब्ध कराती है. भूमि अधिग्रहण और मुआवज़ा तय करने आदि का काम राज्य जिला कलेक्टर या सरकार ही करती है.

विदेशी सरकार उस समय पुलिस और सेना के ज़रिए ज़मीनों पर कब्जा ले लेती थी.

वही व्यवस्था आज भी चालू है. अब वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में नया क़ानून लाने का भरोसा दिलाया है.

हाल में भूमि अधिग्रहण के जितने विवाद आए हैं उनमे सबसे बड़ा प्रश्न यह तय करने का है कि आखिर अधिग्रहण का उद्देश्य क्या वास्तव में लोकहित है?

क्या प्रस्तावित परियोजना से उस क्षेत्र के एवं विस्थापित लोगों का भी कोई लाभ होगा? और दूसरे यह कि वास्तव में कितनी ज़मीन की ज़रुरत है.

उदाहरण के लिए दिल्ली से आगरा के बीच पहले ही मथुरा होते हुए एक चौड़ी सड़क है, जिसे अब छह लेन किया जा रहा है. दूसरी बुलंदशहर, अलीगढ़, हाथरस होते हुए भी एक बढ़िया सड़क है.

फिर गंगा – यमुना दोआब के इस उपजाऊ क्षेत्र में तीसरी तेज़ रफ़्तार भुगतान आधारित ऐसी निजी सड़क की ज़रुरत क्या है, जिसका उपयोग स्थानीय निवासी नहीं कर सकेंगे? इसके अलावा यह सड़क इस पर और उस पार के गाँवों के बीच आवागमन भी मुश्किल कर देगी.

बात केवल सड़क की भी नही है. जब केवल सड़क बनती थी तो अगल बगल के लोग ख़ुश होते थे क्योंकि उसका लाभ उन्हें मिलता था.

मगर सरकार ने 'यमुना एक्सप्रेस-वे' इंडस्ट्रियल अथॉरिटी के लिए अब तक छह ज़िलों के 1182 गावों की ज़मीन अधिग्रहण की अधिसूचनाएं जारी की हैं. यह एक तरह से नोएडा , ग्रेटर नोएडा का विस्तार करके उसे आगरा से जोड़ना है , जिसमे मुख्य रूप से कई नए औद्योगिक एवं आधुनिक नगर, हवाई अड्डा आदि बनेंगे.

गाँव वालों का यह भी कहना है कि परियोजना के चलते इस इलाक़े में ज़मीनें बहुत मंहगी हो गई हैं. बिल्डर खुद भी काई गुना दामों पर रिहायशी और व्यावसायिक प्लाट बेच रहा है.

किसानों को मुआवज़ा उन्हें पुरानी दरों पर मिल रहा है. इसलिए वह अपने परिवार के रहने अथवा खेती की दूसरी ज़मीनें उतने पैसे से नहीं खरीद पा रहे हैं. ये लोग उच्च अथवा तकनीकी या व्यावसायिक शिक्षा से भी लैस नही हैं कि आने वाले उद्योग व्यापार में रोजगार पा सकें.

किसानों के साथ बातचीत में शामिल एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि प्रभावित किसानों की समस्याएँ बिलकुल सही हैं और वर्तमान नियम- क़ानून से उनका हल संभव नहीं है.

सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि खेती की नई ज़मीनें अधिग्रहीत करने से पहले उन तमाम ज़मीनों का सदुपयोग किया जाए जो पहले से उपलब्ध हैं. मसलन कानपुर जैसे शहर में बहुत सी ज़मीनें सालों से बंद कारखानों के पास पड़ी हैं, और सरकार नये औद्योगिक परिसर बनाने के लिए ज़मीन अधिग्रहित कर रही है.

गोरखपुर, भदोही, जौनपुर, अमेठी और कई दूसरे स्थानों पर पहले बनाए गए औद्योगिक परिसर अभी तक खाली पड़े हैं. रेलवे और सेना के पास बहुत सी ज़मीन शहर के बीच अनुपयोगी पड़ी हैं.

शहरों में सरकार लोगों को अपनी ज़मीन पर ज़्यादा मंज़िलें और क्षेत्रफल में निर्माण की अनुमति देकर नगरों का बाहरी विस्तार कम कर सकती है.

दूसरे क्या सरकार को निजी कंपनियों के मुनाफ़े वाले कारोबार के लिए उसी तरह कम दाम पर जबरन ज़मीन अधिग्रहण का अधिकार है , जिस तरह अन्य सार्वजनिक और लोक हित की परियोजनाओं के लिए?

तीसरा यह कि ज़मीन को भी पूंजी मानकर किसानों को इन कंपनियों का हिस्सेदार बनाना चाहिए. ऐसा करने से समावेशी विकास का नारा सार्थक होगा.

चौथी महत्वपूर्ण बात यह है कि खेती की ज़मीन पर उसके मालिक किसान के अलावा भूमिहीन खेतिहर मज़दूर और छोटे कारीगर या व्यावसायी भी आश्रित होते हैं, उनको वैकल्पिक रोजगार के साधन और प्रशिक्षण दिए जाएँ.

इन गावों की सार्वजनिक मसलन खलिहान, चरी, खेल, ईदगाह या रामलीला मैदान आदि की सार्वजनिक उपयोग की ज़मीनों को सरकार निजी कंपनियों को देने के बजाय विस्थापित लोगों को दे सकती है.

शहरी एवं औद्योगिक विकास संबद्ध विभागों से जुड़े रहे वरिष्ठ आईएएस अफसर विद्यानंद गर्ग कहते हैं, "इसके लिए भारत सरकार को अपनी राहत और पुनर्वास नीति नए सिरे से बनानी होगी ताकि जिन लोगों की ज़मीनें विकास के लिए ली जाएँ उन विस्थापित लोगों का भी ठीक से विकास हो सके."

उनका का सुझाव है कि इस काम के लिए एक स्वतंत्र ( सेफ्टी नेट ) प्राधिकरण बनाया जा सकता है.

विद्यानंद गर्ग विस्थापित लोगों को विकास योजनाओं में भागीदार बनाने और उन्हें कंपनियों में शेयर देने की बात भी करते हैं.

यह सुझाव भी है कि विकास योजनाओं के आर्थिक और पर्यावरण संबंधी आकलन के साथ प्रारंभ में ही इसके सामाजिक प्रभावों और परिणामों का अध्ययन कर लिए जाए.

मगर केवल नियम , क़ानून और नीति बनाने से ही काम नहीं चलेगा.

ऐसे नेता और अफ़सर भी चाहिए जो निजी हितों से ऊपर उठकर ईमानदारी से लोक हित में काम करें.

ऐसा इसलिए क्योंकि यह चर्चा आम है कि 'यमुना एक्सप्रेस-वे' औद्योगिक विकास परियोजना में कई नेताओं और अफसरों के निजी स्वार्थ भी शामिल हैं.

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