श्रीलंका में आयोग की जनसुनवाई

श्रीलंका में गृहयुद्ध के आख़िरी साल में हुई घटनाओं की जाँच के लिए बना सरकारी आयोग देश के उत्तरी हिस्से में जन सुनवाई कर रहा है.
उत्तरी श्रीलंका वही इलाक़ा है जो तमिल विद्रोहियों का गढ़ था और पिछले साल यहीं सेना और तमिल विद्रोहियों के बीच मुख्य युद्ध चल रहा था.
ये जन सुनवाई शनिवार और रविवार को चलेगी.
संयुक्त राष्ट्र मानता है कि युद्ध के अंतिम पाँच महीनों में कम से कम सात हज़ार तमिल नागरिकों की मौत हुई. लेकिन सरकार कहती है कि इसके लिए सरकारी सेना ज़िम्मेदार नहीं है.
जाँच आयोग ने आश्वासन दिया है कि किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि बयान देने वाले व्यक्ति की पहचान गोपनीय रखी जाएगी.
लेकिन अमरीकी विदेश विभाग ने चेतावनी दी है कि जो भी सरकार की निंदा करेगा उस पर बदले की कार्रवाई हो सकती है.
उल्लेखनीय है कि अमरीकी कांग्रेस के 57 सदस्यों ने पहले ही कह दिया है कि सरकार ने जिस आयोग का गठन किया है वह विश्वसनीय नहीं है.
सरकार ने आठ लोगों को इस आयोग के सदस्य के रूप में चुना है.
ये सदस्य अब पुराने युद्ध क्षेत्र की जटिलताओं को समझने का प्रयास कर रहे हैं.
उन्होंने आम लोगों को अपने बयान देने के लिए आमंत्रित किया है. कहा गया है कि लोग सार्वजनिक रुप से और गोपनीयता में भी बयान दर्ज करवा सकते हैं.
आयोग वावुनिया में सुनवाई कर रहा है जहाँ हज़ारों तमिल शरणार्थी रह रहे हैं.
आयोग को कैंपों में भी जाकर सुनवाई करनी है. माना जाता है कि इन कैंपों में रह रहे शरणार्थियों में से बहुत लोगों का संबंध तमिल विद्रोहियों के संगठन एलटीटीई से रहा है.
अब तक राजधानी कोलंबो में हुई सुनवाई में आयोग ने 2002 में हुए युद्ध विराम के टूटने की वजह को लेकर सुनवाई की है.
सरकार की ओर से इसका दोष एलटीटीई पर मढ़ा जाता रहा है.
लेकिन अभी तक युद्ध के आख़िरी पाँच महीनों पर कम ही बातें हुई हैं और उस दौरान सेना के व्यवहार पर कम ही बात हुई है.
तमिल विद्रोहियों की इस बात को लेकर निंदा ज़रुर हुई है कि उन्होंने अपने बचाव के लिए लोगों का कवच की तरह इस्तेमाल किया.












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