15 अगस्त विशेष: कितने आज़ाद हैं हम?

Jogeshwari

पारुल अग्रवाल, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत की आज़ादी के लिए एक लंबा संघर्ष हुआ. इतिहास गवाह है कि आज़ादी के लिए इस देश ने कितनी क़ीमत चुकाई है. लेकिन जिस भारत को आज हम देखते हैं क्या यह वही आज़ाद भारत है जिसका सपना करोड़ों हिंदुस्तानियों ने मिल कर देखा था? आज़ादी के इस 64 वीं सालगिरह पर अगले कुछ दिनों हम आप तक पहुंचाएंगे कुछ ऐसे लोगों की कहानियां जो लगातार एक सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश में हैं कि आख़िर कितने आज़ाद हैं हम?

मेरा नाम जोगेश्वरी है. मेरी उम्र 32 साल है और मैं उत्तरप्रदेश के करहिया गांव की रहने वाली हूँ. गांव के मुझे लोग 'डायन" के नाम से पुकारते हैं. आज़ादी के 63वें साल में मेरे लिए आज़ादी के दिन का मतलब है इस कलंक से मुक्ति क्योंकि मैं 'डायन' होने का नहीं नहीं बल्कि अंधविश्वास का दंड भोग रही एक औरत हूं.

मेरी बहन का घर मेरे पड़ोस में है. तीन साल के अंदर बीमारी से उसके दो बच्चों की मौत हो गई. कुछ दिन पहले तीसरी बेटी सोनिया ने भी बीमारी से दम तोड़ दिया. उसका इलाज गांव के एक झोलाछाप डॉक्टर के यहां चल रहा था. अपने बच्चों की बीमारी से परेशान मेरे जीजा सहदेव एक ओझा के पास पहुंचे और मौतों की वजह जाननी चाही. ओझा ने सहदेव को बताया कि इन मौतों की वजह है मेरी जीभ पर बैठा एक भूत.

ओझा ने कहा कि अगर जल्द इस भूत से छुटकारा नहीं मिला तो मौत का सिलसिला जारी रहेगा. आनन-फ़ानन में पंचायत बुलाई गई और मुझे एक पेड़ से बांध दिया. फिर मेरा मुंह खोलकर उसमें चावल डाल दिए गए. आचानक कुछ लोगों ने मुझे पकड़ा और ब्लेड से मेरी जीभ काट दी. गांवभर के सामने मैं चीखती चिल्लाती रही लेकिन किसी ने मेरी कोई मदद नहीं की. मेरे पति से कहा गया कि अगर उन्होंने मुझे बचाने की कोशिश की तो मेरे बच्चों का भी यही हाल किया जाएगा. ख़ून से लथपथ हालत में गांववालों ने मुझे एक कमरे में बंद कर दिया. मेरा मुंह सूज गया और मुझे सांस लेने में तकलीफ़ होने लगी.

इस घटना की जानकारी किसी तरह गोविंदपुरी गांव के एक सामाजिक कार्यकर्ता जगत नारायण और प्रभात तक पहुंची. वो पुलिस की टीम लेकर मुझे छुड़ाने आए और अस्पताल में भर्ती कराया. मैं चाहती हूं कि जिन लोगों ने मेरे साथ ऐसा किया उन्हें इस किए की सज़ा मिले. ये कहानी अकेले मेरी नहीं. दूर-दराज़ गांव में न जाने कितनी औरतों को डायन ठहराकर मार दिया जाता है. गांवों में आज भी औरत का जन्म दुख झेलने के लिए ही होता है. सच तो ये है कि भारत आज़ाद हो या ग़ुलाम हमारे लिए न कुछ बदला है न बदलेगा.

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