'जागरूकता और सहानुभूति से मानसिक रोग से बचा जा सकता है'
ये विशेषज्ञ तमिलनाडु में हुई इरावडी त्रासदी की 10 वीं बरसी पर आयोजित एक संगोष्ठी में बोल रहे थे। छह अगस्त, 2001 में हुई इस त्रासदी में 28 मानसिक रोगियों की मौत हो गई थी। ज़ंजीर से बंधा होने के कारण वे अपनी जान नहीं बचा सके थे।
गोष्ठी में चर्चा के दौरान मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में न्यायिक सुधारों और सामाजिक सक्रियता पर जोर दिया गया। अपंग लोगों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई।
दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए.पी. शाह ने कहा कि इरावडी हादसे के बाद कई सकारात्मक बदलाव आने चाहिए थे। लेकिन यह जान कर दुख होता है कि कानून अभी भी मानसिक रोगियों से समाज की सुरक्षा की बात करता है।
विकलांग अधिकार समूह के निदेशक, जावेद आबिदी ने कहा, "हमें मानसिक रोगियों के अधिकार पर विचार करने की जरूरत है। उन्हें ऐसी स्थितियों में रखा जाता है, जहां वे जंजीरों से बंधे होते हैं, अपने परिवार और दोस्तों से दूर होते हैं और उन्हें नशीली दवाएं दी जाती हैं, जिससे उनकी बीमारी और बढ़ जाती है। ऐसे में उनके अधिकारों का हनन होता है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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