बीमारी के साथ निरक्षरता का भी उपचार !
गोरखपुर, 8 अगस्त (आईएएनएस)। उत्तर प्रदेश की एक बाल रोग चिकित्सक औरों से जरा हटके हैं। वह दवाइयों और टीकाकरण से बीमारियों को ठीक करने के साथ-साथ निरक्षरता का भी उपचार करती हैं।
गोरखपुर शहर में रहने वाली बाल रोग विशेषज्ञ डा. नंदिनी घोष अपने क्लीनिक में पटरी दुकानदारों, सब्जी विक्रेताओं और झोपड़ी के बच्चों को वर्षो से मुफ्त में शिक्षा देती आ रही हैं। दीप क्लीनिक नाम से मशहूर उनका क्लीनिक शहर के व्यस्त गोरखनाथ इलाके में है।
सुबह और शाम के समय डा. घोष क्लीनिक पर आने वाले मरीजों को देखती हैं। दोपहर के समय वह चिकित्सक से शिक्षक की भूमिका में आ जाती हैं और क्लीनिक के वेटिंग रूम को क्लासरूम में तब्दील कर बच्चों को उसी में पढ़ाती हैं।
डा. घोष ने आईएएनएस से कहा, "गरीब बच्चों को पढ़ाने में मुझ्झे जो खुशी और संतुष्टि मिलती है मैं उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती। बच्चों के साथ समय बिताकर आप अपनी सारी चिंताएं भूल जाएंगी।"
वह कहती हैं, "जिन बच्चों को पढ़ाती हूं उनमें से ज्यादातर कभी स्कूल नहीं गए। वे सड़कों पर सब्जी और फलों के ठेला लगाने वाले विक्रताओं के बच्चे हैं। उनके माता-पिता ने स्कूल भेजने के बजाय उन्हें बचपन से अपने साथ धंधे में लगा रखा है।"
घोष अपने क्लीनिक में अब तक करीब 300 बच्चों को शिक्षित कर चुकी हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने उनमें से कई को अपने खर्च से सरकारी स्कूल में प्रवेश दिलवाया, ताकि वे अपनी औपचारिक शिक्षा जारी रख सकें। उन्होंने वर्ष 2002 में बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया।
वह याद करती हैं कि क्लीनिक आते समय सामने सड़क पर छोटे-छोटे बच्चों को अपने माता-पिता की सब्जी, फल व अन्य सामान बेचने में मदद करते देखा करती थीं। इन बच्चों को देखकर उन्हें बहुत दुख होता था। तभी उनके दिमाग में बच्चों को पढ़ाने का विचार आया।
डा. घोष के सामने उस समय एक बड़ी चुनौती थी उन माता-पिता को इस बात के लिए तैयार करना कि वे अपने बच्चों को पढ़ने के लिए उनके क्लीनिक में भेजें।
वह बताती हैं, "शुरुआत में जब मैंने बच्चों के माता-पिता से कहा तो उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया। मुझे उस समय थोड़ी निराशा जरूर हुई पर मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी और बच्चों के माता-पिता को राजी करने की कोशिश करती रही। कुछ समय बाद उन्हें अहसास हुआ कि शायद मैं उनके भले की बात कर रही हूं। फिर उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए मेरे पास भेजना शुरू कर दिया।"
डा. घोष शिक्षकों से मिलकर उन बच्चों की पढ़ाई के बारे में जानकारी लेती हैं, जिन्हें उन्होंने सरकारी स्कूलों में औपचारिक शिक्षा के लिए प्रवेश दिलाया था।
वर्तमान में डा. घोष अपने क्लीनिक में करीब 30 बच्चों को पढ़ा रही हैं। कभी-कभी घोष के मरीजों के परिजन खासकर महिलाएं बच्चों को पढ़ाने में उनकी मदद करती हैं।
डा. घोष कहती हैं कि गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कालेज में नेत्र रोग विभागाध्यक्ष उनके पति आशीष घोष ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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