'कश्मीर में इस बार कुछ अलग किस्म का आक्रोश है'
सड़कों से लेकर घरों तक में शोक और आक्रोश का वातावरण है। 11 जुलाई से जारी हर रोज मौत के तांडव में मरने वालों की संख्या 40 को पार कर गई है। पिछले शुक्रवार से अब तक 26 लोग मारे गए हैं। खबर लिखे जाने तक चार लोग मंगलवार को गोलीबारी में मारे गए।
बढ़ई गिरी का काम करने वाले अब्दुल राशिद खान (65) ने अपने जीवन में कई क्रांति देख चुके हैं, लेकिन वे कुछ समय बाद ठंडी पड़ जाती थीं।
खान ने कहा, "लेकिन मुझे विश्वास है कि इस बार स्थिति ने अलग मोड़ ले लिया है। हर कोई कुर्बानी देने को तैयार है। अन्याय का शासन या तो अब खत्म हो जाएगा या तो फिर कभी नहीं।"
खान दिन भर में मुश्किल से 300 रुपये कमा लेते हैं और उनकी पत्नी श्रीनगर के बाहर अंचार नामक एक अर्धग्रामीण इलाके में एक छोटे से घर में अकेले रहती हैं। खान का एक मात्र बेटा बशीर अहमद बेंगलुरू में किसी निजी कंपनी में काम करता है।
खान ने आईएएनएस को फोन पर बताया, "आज लगातार तीसरा दिन है, जब दूधवाला मेरे घर दूध लेकर नहीं आया। हमारे घर के बगल में स्थित बेकरी वाले ने कई दिनों से अपनी दुकान नहीं खोली है। घर में रखा सारा खाद्यान्न समाप्त हो चुका है और हमारे पास खाने को कुछ भी नहीं बचा है और पिछली रात से हम भूखे हैं।"
संकटग्रस्त घाटी में खान अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं है।
रोजाना की इस मुसीबत से तमाम अन्य लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि कश्मीरी मुसलमान दो पीढ़ियों से 20 वर्ष पुराने रक्त रंजित अलगाववादी युद्ध के गवाह रहे हैं। इस युद्ध में 1989 से अब तक कोई 70,000 लोग मारे जा चुके हैं।
खान ने कहा, "मैं नहीं समझता कि वर्तमान स्थिति में कुछ नया है। हम कष्ट सह रहे हैं और यदि कश्मीरी मुसलमानों द्वारा पीढ़ियों से सही जा रही पीड़ा का अंत होता है तो हम और भी कष्ट सहने को तैयार हैं।" खान कहते हैं कि राज्य के लोगों में यह धारणा घर कर गई है कि यदि "अब नहीं तो कभी नहीं"।
अब्दुल मजीद कापरा (45) ने तीन महीने पहले ऑटो रिक्शा खरीदने के लिए एक बैंक से ऋण लिया था। लेकिन इस अशांति के बीच उनके पास घर में रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
कापरा का कहना है, "मैं आजादी के आंदोलन के साथ हूं।" लेकिन वह अपने तीन बच्चों को लेकर चिंतित हैं। तीनों की उम्र क्रमश: 10, आठ और तीन साल है।
कापरा ने आईएएनएस से कहा, "मैं इस तरह की कोई शिकायत नहीं कर रहा हूं। हर कोई कष्ट उठा रहा है, लेकिन मुझे चिंता इस बात की है कि यदि हम अपने बच्चों को नहीं पाल सकते तो क्या इस आंदोलन को जिंदा रख पाएंगे।"
शफत मुज्तबा नामक एक 18 वर्षीय प्रदर्शनकारी छात्र ने कहा, "हमें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से कुछ भी लेना-देना नहीं है। उनका काम हत्या करने का आदेश देना है और वह अपना काम कर रहे हैं। लेकिन देखते हैं कि वह कब तक ऐसा कर पाते हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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