राजा की जान तोते में

राजा की जान तोते में

इक़बाल अहमद

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत में एक पुरानी कहावत है राजा की जान तोते में. गुजरात के इस्तीफ़ा दे चुके गृह राज्यमंत्री अमित शाह पर सीबीआई का कसता शिकंजा शायद इस मिसाल का एक बेहतरीन उदाहरण है.

सीबीआई का दावा है कि सोहराबुद्दीन मामले में उनके ख़िलाफ़ पर्याप्त सबूत हैं.

शुक्रवार को सीबीआई ने अमित शाह समेत 15 लोगों के ख़िलाफ़ अदालत में आरोप पत्र भी दाख़िल कर दिया. लेकिन आप सोच रहें होंगे कि एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले से राजा और तोते के उदाहरण का क्या लेना देना.

भारत में ना तो फ़र्ज़ी मुठभेड़ पहली बार हुई है ना ही किसी आपराधिक मामले में किसी मंत्री का नाम पहली बार आया है.भारत प्रशासित कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़ के जंगलों तक कई जगहों से फ़र्ज़ी मुठभेड़ की ख़बरें आती रहती हैं.

दरअसल ये मामला सिर्फ़ ना तो एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ का मामला है ना ही किसी मंत्री का किसी आपराधिक मामले में शामिल होने का मामला है.

अमित शाह, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कुछ सबसे क़रीबी लोगों में से एक हैं. 2002 के गुजरात दंगों और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में गुजरात पुलिस के कई वरिष्ठ अधिकारी जेल में हैं, यहां तक की गुजरात सरकार की एक मंत्री माया कोडनानी को भी दंगों में शामिल होने के आरोप में इस्तीफ़ा देना पड़ा और फिर बाद में उन्हें जेल भी जाना पड़ा.

अब अमित शाह पर क़ानूनी शिकंजा कसता जा रहा है और क्या भाजपा में अफ़रा-तफ़री का कारण यह है कि अगला निशाना ख़ुद मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हो सकते हैं.

भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी सिर्फ़ एक राज्य के मुख्यमंत्री नहीं हैं. पार्टी में उनका क़द पार्टी के और दूसरे मुख्यमंत्रियों के मुक़ाबले ज़्यादा बड़ा है.

पार्टी का एक बड़ा धड़ा मोदी को भविष्य के नेता के रुप में देखता है. पिछले चुनाव में तो पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए भी उनका नाम उछला लेकिन फ़ौरन ही उसे दबा दिया गया.

लेकिन पार्टी पर उनकी मज़बूत पकड़ का सबूत उस समय देखने को मिला जब शुक्रवार को दिल्ली में आडवाणी के घर पर बैठक हुई और सुषमा स्वराज तथा अरूण जेटली समेत पूरी पार्टी अमित शाह के बचाव में उतर गई.

ये कहने की ज़रुरत नहीं की पार्टी अमित शाह के नाम पर दरअसल मोदी का बचाव करना चाहती है. भाजपा केंद्र सरकार पर सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगा रही है.

सीबीआई पर सत्तारूढ़ पार्टी के दबाव में काम करने का आरोप कोई नई बात नहीं है लेकिन इस मामले में भाजपा ये भूल रही है कि सोहराबुद्दीन मुठभेड़ की जांच सीबीआई सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कर रही है और वो सर्वोच्च अदालत को ही रिपोर्ट करती है.

पार्टी के लिए दूसरी बड़ी समस्या है कि सीबीआई और कई राज्यों में आतंकवाद निरोधक दल की जांच में पहली बार चरमपंथी गतिविधियों और बम धमाकों में राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के नाम सामने आए हैं. मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह और मालेगांव धमाके में अब तक गिरफ़्तार कई लोगों के तार संघ से जुड़े होने के संकेत मिल रहें हैं.

ज़ाहिर है राष्ट्रवाद और जिहादी आतंकवाद के मुद्दे पर बहुसंख्यक हिंदू मतदाता को अपनी ओर आकर्षित करने वाली पार्टी के लिए ये ख़बर अच्छी नहीं कही जा सकती. हो सकता है कि इस सारे प्रकरण से गुजरात में भाजपा को राजनीतिक लाभ हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को इससे काफ़ी नुक़सान हो सकता है.

सोमवार यानि 26 जुलाई से संसद का मॉनसून सत्र शुरु हो रहा है. भाजपा को उम्मीद थी कि मंहगाई, विदेश मंत्री की पाकिस्तान यात्रा, रेल दुर्घटना, कश्मीर में जारी हिंसा और भोपाल गैस त्रासदी पर अदालती फ़ैसले के बाद उठे विवाद जैसे मुद्दों पर वो सरकार को घेरेगी और इन मुद्दों पर विपक्ष भी उसका साथ देगा.

लेकिन इस बदले हुए परिवेश में भाजपा को डर है कि विपक्ष की एक़ुटता को क़ायम रख पाना संभव नहीं होगा.

पार्टी इस बात से भी चिंतित है कि विपक्ष तो दूर ये ऐसा नाज़ुक मामला है कि उसके सहयोगी भी उसके साथ पूरी मज़बूती से खड़े होने में संकोच कर सकते हैं. नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी का आपसी प्रेम कितना है ये सभी जानते हैं.

शायद इन्हीं कारणों से अमित शाह का मामला राजा और तोते की मिसाल है.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+