सर्वोच्च न्यायालय में महिला आयोग की याचिका खारिज
अदालत ने इस आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था, क्योंकि उसने जेल प्रवास के दौरान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास कर अपने को बदल डाला था।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति हरजीत सिंह बेदी और न्यायमूर्ति सी.के.प्रसाद की खण्डपीठ ने आयोग की याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उच्च न्यायालय द्वारा अशोक कुमार राय को मुक्त करने के फैसले को चुनौती देने का उसके पास कोई अधिकार नहीं है।
आयोग की याचिका तब खारिज की गई, जब दिल्ली सरकार की ओर से प्रस्तुत हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता मोहन पारासरन ने कहा कि वह दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती नहीं देना चाहते।
राय को एक 21 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार करने के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उस लड़की ने उसके बाद 2003 में आत्महत्या कर ली थी। राय उसे एक ट्यूटर के रूप में रसायन शास्त्र पढ़ाता था। राय को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के लिए भी दोषी ठहराया गया था।
पीड़ित ने अपनी सुसाइड नोट में लिखा था कि राय उसे नशीली दवाएं देता था और उसके बाद उसके साथ बलात्कार करता था। इसी सबूत के आधार पर निचली अदालत ने राय को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
दोनों के बीच संबंध लगातार जारी रहा, क्योंकि राय ने उसके साथ शादी का वादा किया था। लेकिन बाद में उसने किसी और व्यक्ति के साथ यौन संबंध स्थापित करने के लिए उसे मजबूर किया। उसके बाद लड़की ने आत्महत्या कर ली थी।
उच्च न्यायालय ने राय के खिलाफ बलात्कार के दोष को तो बरकरार रखा, लेकिन आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के आरोप से मुक्त कर दिया।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था, "हम निचली अदालत के न्यायाधीश के विचार से सहमत हैं कि शादी के वादे के आधार पर पीड़ित को राजी किया गया था, जबकि शुरू से ही याची का इरादा शादी का नहीं था। शादी का प्रस्ताव सिर्फ लड़की के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने के लिए था।"
अच्छे आचरण के आधार पर राय की सजा को कम करते हुए अदालत ने कहा था कि राय साढ़े पांच साल का कारावास पहले ही भुगत चुका है।
अदालत ने कहा कि राय ने प्रशासनिक सेवा परीक्षा में शामिल होकर और उसे पास कर अपने को बदल डाला है। लिहाजा उच्च न्यायालय उसके आजीवन कारावास को उसके द्वारा पहले ही भुगती जा चुकी कारावास की सजा में बदल कर उसे मुक्त करता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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