'टाइम' के लेख से नाराज़ भारतीय

'टाइम' के लेख से नाराज़ भारतीय
अमरीकी पत्रिका 'टाइम' में प्रकाशित एक हास्य लेख ने वहाँ रह रहे भारतीयों को नाराज़ कर दिया है और उन्होंने इस लेख पर नस्लवादी होने का आरोप लगाया है.

भारतीय अमरीकियों की नाराज़गी भरी प्रतिक्रियाओं के बाद 'टाइम' ने और इस लेख के लेखक जोएल स्टीन ने खेद जताया है. 'माई ओन प्राइवेट इंडिया' नाम का यह लेख पत्रिका के पाँच जुलाई के अंक में प्रकाशित हुआ था और इसमें जोएल स्टीन ने लिखा था कि किस तरह से उसका अपना शहर भारतीयों के वहाँ बसने के बाद एकदम बदल गया.

इन बदलावों को लेकर उन्होंने कई ऐसी टिप्पणियाँ की हैं जिस पर भारतीय समुदाय ने गंभीर आपत्ति और नाराज़गी जताई है. यह लेख एडीसन, न्यू जर्सी नाम के शहर पर लिखा गया है. इस इलाक़े की लगभग एक तिहाई आबादी अब भारतीय मूल के लोगों की है. लेखक ने अपने बचपन को याद करते हुए लिखा है कि किस तरह से उन्होंने इस इलाक़े को बदलता हुआ देखा है.

उन्होंने लिखा है कि किस तरह से पित्ज़ा हट की जगह भारतीय मिठाई की दुकान खुल गई है और जहाँ वह अपने दोस्तों के साथ 'सिर्फ़ वयस्कों वाली' फ़िल्म देखा करते थे वहाँ अब सिर्फ़ बॉलीवुड फ़िल्म दिखाई जाती है और वहाँ सिर्फ़ समोसा मिलता है. इस लेख के जिन हिस्सों पर लोगों ने आपत्ति की है उनमें से एक हिस्सा वह है जिसमें वहाँ बसे अपने भारतीयों के अपने रिश्तेदारों को वहाँ लाने का ज़िक्र है.

इस हिस्से में जोएल ने लिखा है, "हम सब मानते थे कि सभी भारतीय विद्वान होते हैं, लेकिन 1980 के दशक में डॉक्टरों और इंजीनियरों ने अपने व्यापारी कज़िन (चचेरे-मेमेरे भाइयों) को बुला लिया. तब हम उनके विद्वान होने के प्रति इतने आश्वस्त नहीं रह गए, फिर उन व्यापारियों ने अपने से भी कम बुद्धि वाले व्यापारी कज़िन को बुला लिया तब हमें यह समझ में आने लगा कि क्यों भारत इतना ग़रीब है."

एक और जगह उन्होंने भारतीयों और उनके देवी देवताओं का मज़ाक बनाया है. वे लिखते हैं कि एडीसन में इतने भारतीय हो गए थे कि वे वहाँ की संस्कृति को बदल देते और उन्हें वहाँ 'डॉट हेड्स' के नाम से पुकारा जाने लगा था, जिसे एक नस्लीय संबोधन माना जाता है. वे लिखते हैं कि उनके मन में सवाल उठता है कि जिन लोगों के भगवानों के कई हाथ होते हों और जिनकी नाक हाथी की तरह होती हो उनके लिए क्या 'डॉट हेड्स' सबसे अच्छा नस्लीय संबोधन था.

जोएल स्टेन ने इसी तरह की कुछ और टिप्पणियाँ की हैं जिन पर भारतीय मूल के अमरीकियों ने आपत्ति जताई है. इस लेख पर 'साउथ एशियन अमरीकन्स लीडिंग टुगेदर' (साल्ट) नाम की संस्था ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और इस लेख के ख़िलाफ़ एक हस्ताक्षर अभियान चलाया है.

हस्ताक्षर अभियान में शामिल हुए 1300 लोगों के हस्ताक्षरों के साथ साल्ट की कार्यकारी निदेशक दीपा अय्यर, सिख कोलिशन की कार्यकारी निदेशक सप्रीत कौर और मानवी नाम की संस्था की कार्यकारी निदेशक मनीषा केलकर ने संयुक्त रूप से जोएल स्टीन को एक पत्र लिखा है. इन लोगों ने ये सभी हस्ताक्षर टाइम पत्रिका के प्रबंधन को भी भेजा है.

इस पत्र में लिखा गया है कि लेख विदेशी लोगों के प्रति भय से ग्रस्त दिखता है. इस लेख के ख़िलाफ़ टाइम पत्रिका की वेबसाइट पर भी लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. ट्विटर के ज़रिए एक हज़ार से भी अधिक लोगों ने इस पर टिप्पणी की है. इन प्रतिक्रियाओं पर एक नज़र डालने से पता चलता है कि बहुत से भारतीय मूल के लोगों को इस लेख ने आहत किया है.

इन प्रतिक्रियाओं के बाद टाइम पत्रिका और लेखक जोएल स्टीन दोनों ने खेद व्यक्त किया है. टाइम ने लिखा है, "यदि इस हास्य लेख 'माई ओन प्राइवेट इंडिया' से हमारे किसी पाठक को ठेस पहुँची हो तो हमें खेद है. इसका उद्देश्य किसी को आहत करना नहीं था."

इस लेख के लेखक जोएल स्टीन ने लिखा है, "मुझे इस बात का दुख है कि मैंने इतने सारे लोगों को ठेस पहुँचाई. मैं तो यह समझाने का प्रयास कर रहा था कि ऐसा कोई व्यक्ति जो यह मानता है कि आप्रवासन ने अमरीकी जीवन और ख़ासकर मेरे अपने शहर को फ़ायदा पहुँचाया है, लेकिन जब मैं अपने शहर में गया तो परिवर्तनों को देखकर मुझे थोड़ा सदमा भी लगा."

वे लिखते हैं, "यदि मेरी इस प्रतिक्रिया को समझ लिया जाता तो अप्रावस के दूसरे पहलू पर चर्चा करने में हमें और अधिक सहायता मिलती." लेकिन जिस तरह से प्रतिक्रियाओं का सिलसिला जारी है उससे लगता नहीं कि लोगों की नाराज़गी दूर हुई है.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+