तिब्बतियों में तेज़ी से आनुवांशिक परिवर्त्तन

साइंस नामक जानी मानी पत्रिका में छपे एक शोध के मुताबिक़ मानव इतिहास में तिब्बतियों में सबसें ज़्यादा तेज़ी से आनुवांशिक परिवर्त्तन हुए हैं.
अमरीका और चीन के वैज्ञानिकों के एक दल ने तिब्बत में समुद्र तल से पांच किलोमीटर की उंचाई पर बसे गावों के 50 नागरिकों के जीन की जांच की. उसके बाद बिजिंग में रह रहे हन चीनियों से उनका तुलनात्मक अध्य्यन किया.
आज से लगभग तीन हज़ार साल पहले तिब्बती लोग आज के चीन को छोड़ पहाड़ों में जा कर बस गए थे.समुद्र तल से उपर गावों में उन्होंने अपना डेरा बनाया.
समुद्र तल से पांच किलोमीटर की उंचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा समुद्र तल पर मिलने वाली ऑक्सीजन के मुक़ाबले 40 प्रतिशत कम होती है.
मानव जाति के लिए कम ऑक्सीजन का मिलना ठीक नहीं हैं क्योंकि मानव को जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है.
उंचाई पर रहने वाले ज़्यादातर लोग जल्दी थक जाते हैं, सिरदर्द से परेशान रहते हैं, नवजात शिशुओं का वज़न कम होता है यहां तक की शिशु मृत्यु दर भी अधिक होती है.
ऐसा मालूम होता है कि तिब्बतियों में तीस बार आनुवांशिक परिवर्त्तन हुए हैं क्योकि उंचाई पर रहे तिब्बतियों के स्वास्थ्य में ऐसी किसी भी तरह की समस्या नहीं पाई गई है.
उससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात ये है कि इन तिब्बतियों में ये परिवर्त्तन बहुत कम समय में हुए हैं.
हमारे पूर्वज होमो सेपियंस की ही बात करें तो उन्हें मौजूदा मानव का रूप लेने में लगभग एक लाख पचास हज़ार साल लगे.
शोध के अनुसार उन तिब्बतियों में जो परिवर्त्तन हुए हैं उनमें आधे से ज़्यादा उन जीनों में परिवर्त्तन हुए हैं जो ये निर्धारित करते हैं कि शरीर ऑक्सीजन को कैसे इस्तेमाल करता है.
ईपैस 1 जीन में परिवर्त्तन से लाल रक्त कोशिकाएं बनती हैं जो हिमोग्लोबीन की मात्रा बढ़ाती है.
हिमोग्लोबीन शरीर के दूसरे हिस्सों में ऑक्सीजन ले जाता है.
90 प्रतिशत तिब्बतियों में ये तबदीली हुई थी लेकिन केवल दस प्रतिशत हन चीनियों में ये परिवर्त्तन देखे गए हैं.
वैज्ञानिकों का मानना है कि यही बदलाव वे कारण बनें जिनकी वजह से तिब्बती लोग उंचाई पर रह सके.












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