ठगा सा महसूस कर रहा है आम आदमी (संप्रग सरकार का 1 वर्ष)
आईएएनएस की ओर से देशव्यापी कराए एक नमूना सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है। सर्वेक्षण में यह भी पता चला है कि 'आम आदमी' ने महिला आरक्षण विधेयक और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) जैसी केंद्र की उपलब्धियों की सराहना की है।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कार्यरत तथा पेशे से शिक्षक ए. एन. त्रिपाठी कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया था क्योंकि कांग्रेस ने आम आदमी के हित में कई प्रमुख वादे किए थे। "लेकिन आम आदमी की फिक्र कौन करता है। महंगाई आसमान छू रही है।"
देश के विभिन्न हिस्सों से रोजगार की तलाश में दिल्ली आने वालों को महंगाई की मार कुछ ज्यादा ही झेलनी पड़ रही है क्योंकि उनकी आमदनी रोजाना के मेहनताने पर आधारित होती है।
पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले 24 वर्षीय संतोष कुमार का कहना है, "मैं अपनी कमाई का अधिकांश हिस्सा अपने घर (बिहार) भेज देता हूं। अपने लिए सिर्फ 1500 रुपये रखता हूं। लेकिन 1500 रुपये में अब काम चलाना मुश्किल हो गया है।" कुमार अपनी आमदनी से अपने परिवार के सात लोगों का पेट भरते हैं।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस हमेशा से ही आम आदमी की बात और 'कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ' का नारा बुलंद करती रही है। लेकिन उसके शासन में आम आदमी खुद को ठगा महसूस कर रहा है।
उत्तर प्रदेश के लखनऊ की गृहिणी सरोज नेगी और छत्तीसगढ़ के रायपुर की स्कूल शिक्षिका सविता सिंह ने अपना गुस्सा कुछ इस कदर बयां किया।
नेगी ने कहा, "सरकार आम आदमी को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जताती रही है लेकिन महंगाई पर काबू पाने में वह पूरी तरह नाकाम रही है। इस मोर्चे पर उसने आम आदमी को सबसे अधिक प्रभावित किया है।"
चण्डीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय की छात्र जसप्रीत कौर कहती हैं, "महंगाई इतनी है कि सिर्फ धनी व्यक्ति ही अब शहरों में गुजर बसर कर सकते हैं।"
मुंबई के सॉफ्टवेयर इंजीनियर हितार्थ बेनानी कहते हैं कि वर्तमान वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में महंगाई पर लगाम कसना आसान नहीं है। वह कहते हैं, "आर्थिक संकट और जलवायु संबंधी समस्याओं से संप्रग सरकार को निपटना है। इसके चलते महंगाई बढ़ी है। आज जो स्थिति हैं, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यदि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार होती तो वह पूरी तरह विफल साबित होती।"
नक्सली हिंसा की घटनाएं भी लोगों के दिलोंदिमाग पर छाई हुई हैं। आए दिन हो रही नक्सली घटनाओं ने केंद्र सरकार के माथे पर भी शिकन ला दी है।
उड़ीसा में स्वैच्छिक संगठन चलाने वाले किसान जगदीश प्रधान कहते हैं, "जनजातियों तथा अन्य के बीच नक्सलियों का बढ़ता प्रभाव संप्रग सरकार की एक बड़ी असफलता है। वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की धीमी गति और किसानों की लगातार बढ़ती चिंताओं से संकेत मिलता है कि संप्रग सरकार आम आदमी से कोसो दूर है।"
त्रिपुरा के उद्योगपति स्वपन पॉल की इस बारे में मिश्रित प्रतिक्रिया आई है। वह कहते हैं, "केंद्र सरकार ने राशि तो उपलब्ध कराई है लेकिन इसका फल लोगों को नहीं मिल पा रहा है। क्योंकि इसकी सही तरीके से निगरानी नहीं हो रही है। औद्योगिक परियोजनाएं स्थापित करने में सरकार की ओर से कई बाधाएं आड़े आती हैं।"
महंगाई और नक्सल समस्या के मुद्दे पर सरकार जहां चौतरफा घिरी दिखाई पड़ रही है वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो संप्रग के प्रदर्शन से खुश भी हैं। खासकर महिला आरक्षण विधेयक और ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना से।
गुड़गाव की एक गृहिणी यशोदा देवी बताती हैं, "महिला आरक्षण विधेयक महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक उपयुक्त कदम है। जनसंख्या के आधार पर उन्हें काम करने का भरपूर मौका मिलेगा। धीरे-धीरे महिलाएं पुरूषों से भी आगे निकल जाएंगी।"
केरल के कोट्टायम जिले की एक महिला ने बताया, "मनरेगा हमारे लिए वरदान साबित हुआ है। अब हमें काम की तलाश में इधर-उधर भागना-दौड़ना नहीं पड़ता है। यदि कोई काम करना चाहता है तो वह जाकर कर सकता है। इसका समय भी हमारे अनुकूल है।"
हिमाचल प्रदेश के सेवानिवृत अधिकारी एम. आर. कौदल सरकार द्वारा शुरू की गई अनन्य पहचान पत्र परियोजना से बड़े आकर्षित हैं। वह कहते हैं, "यह भी सरकार की उपलब्धियों में है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












Click it and Unblock the Notifications