नक्सल समर्थक संगठनों पर गृह मंत्रालय की नजर
नक्सल प्रभावित राज्यों में अर्ध सैनिक बलों और पुलिस प्रमुखों को जारी एक अलर्ट में कहा गया है कि भाकपा (माओ) के पास किसानों, श्रमिकों, महिलाओं, छात्रों, जनजातियों व मजदूर संगठनों की 57 फ्रंटल इकाइयां हैं। इन संगठनों ने इस प्रतिबंधित संगठन की सामरिक क्षमता बढ़ाने में मदद की है। इसमें अदालती लड़ाइयों को जीतना और गिरफ्तार नक्सली नेताओं की रिहाई कराना शामिल है।
सूत्रों के अनुसार यह सर्कुलर उस समय जारी किया गया था, जब कुछ दिनों पहले ही गृह मंत्रालय ने सामाजिक संगठनों को कड़ी चेतावनी दी थी कि जो लोग नक्सलियों के पक्ष में बोलेंगे, उन्हें अनधिकृत गतिविधि निरोधक कानून 1967 के तहत कानूनी कार्रवाई और 10 वर्षो के कारावास का सामना करना पड़ेगा।
गृह मंत्रालय ने छह अप्रैल को कहा था कि सरकार ने गौर किया है कि कुछ नक्सली नेता अपनी विचारधारा के प्रचार के लिए कुछ गैर सरकारी संगठनों और बुद्धिजीवियों से सीधे संपर्क में हैं।
एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा कि इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की ओर से जारी सर्कुलर में कहा गया है कि इनमें से लगभग 30 संगठन सक्रिय रूप से नक्सली विचारधारा के प्रचार में लिप्त हैं। यह गतिविधि उन राज्यों में भी जारी है, जहां नक्सलियों का प्रभाव नहीं है। इन राज्यों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, केरल, तमिलनाडु और हरियाणा जैसे राज्य शामिल हैं।
जिन संगठनों पर नजर रखी जा रही है, उनमें पीपुल्स युनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) भी शामिल है। न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राजेंद्र सच्चर इस संगठन के एक प्रमुख सदस्य हैं। इस संगठन की स्थापना 1976 में जय प्रकाश नारायण ने थी।
जिन अन्य संगठनों पर नजर रखी जा रही है, उनमें क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन (उत्तराखण्ड), रिवल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट ऑफ केरल, छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (इस राजनीतिक पार्टी ने मध्य प्रदेश चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े किए थे), दिशा सांस्कृतिक मंच (हरियाणा) और बंदी मुक्ति कमेटी (पश्चिम बंगाल) शामिल हैं।
अधिकारी ने कहा कि आईबी के सकरुलर के अनुसार ये संगठन नक्सलियों के लिए काम कर रहे हैं।
आईबी के अनुसार नक्सली युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) और हुर्रियत कांफ्रेंस सहित देश में अन्य आतंकी व अलगाववादी संगठनों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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