बरसी पर गिने-चुने लोगों ने प्रभाकरन को याद किया
नई दिल्ली, 17 मई (आईएएनएस)। तमिल विद्रोहियों के प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन के मारे जाने के एक वर्ष बाद भी श्रीलंका नस्लीय आधार पर बंटा हुआ दिखाई दे रहा, लेकिन ज्यादा लोगों ने प्रभाकरन के लिए शोक नहीं जताया है।
जहां कोलंबो में लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) की सेना के हाथों अंतिम पराजय का जश्न मनाया जा रहा है, वहीं सरकार विरोधी तमिल नेशनल एलायंस (टीएनए) ने पिछले वर्ष मई महीने में समाप्त हुए युद्ध के अंतिम महीनों में मारे गए हजारों नागरिकों के लिए शोक मनाने का आह्वान किया।
श्रीलंका के बहुसंख्यक सिंहली समुदाय में भी तमिलों की पीड़ा सहानुभूति जगा सकती है, लेकिन प्रभाकरन को कुछ श्रीलंकाई दुखद रूप में याद करते हैं।
श्रीलंकाई तमिल समुदाय के एक प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ता राजन हूले ने प्रभाकरन के बारे में कहा, "क्रूर और दिवालिया होने के साथ ही वह एक दुष्ट व्यक्ति भी था।"
हूले ने आईएएनएस के साथ फोन पर बातचीत में कहा, "प्रभाकरन के मकसद चाहे जो भी रहे हों, मगर तमिलों को विपरीत दिशा में ले जाया गया है। लेकिन यह इस कहानी का एक हिस्सा भर है। तमिल समस्या के साथ सरकार जिस तरीके से निपट रही है, लगता है कि अंतिम जीत प्रभाकरन की ही हुई है।"
रक्तरंजित युद्ध के अंतिम चरणों में जीवित बच गए हजारों तमिल नागरिक आज भी देश के उत्तर में स्थिति शरणार्थी शिविरों में रहने को अभिशप्त हैं। कई पूर्व तमिल कार्यकर्ता सेना के हिरासत में हैं।
ऐसा नहीं है कि प्रभाकरन को भुला दिया गया है। दशक भर पहले श्रीलंका से पलायन कर पश्चिम में जा बसे तमाम तमिल नागरिक प्रभाकरन को आज भी अपने नायक रूप में याद करते हैं और उसकी विरासत को जीवित रखना चाहते हैं।
लेकिन श्रीलंका में तमिल समुदाय के बीच प्रभाकरन से सहानुभूति रखने वाले गिने-चुने लोग ही बचे हैं। सामान्य रूप में ऐसा इसलिए है, क्योंकि आज जिन समस्यों से वे जूझ रहे हैं, उसके लिए लिट्टे ही जिम्मेदार है।
प्रभाकरन को जाफना में छात्र जीवन से जानने वाले तमिल राजनीतिज्ञ धर्मालिंगम सीथार्थन ने कहा, "तमिल लोग दोबारा कोई दूसरा सशस्त्र संघर्ष नहीं करना चाहते। लेकिन श्रीलंका के उत्तर पूर्व में जो लोग हैं वे अभी भी प्रभाकरन को तमिल राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में देखते हैं।"
सीथार्थन और अन्य कई तमिलों ने आईएएनएस से बातचीत की। इनमें से कुछ ने अपना नाम गोपनीय रखने के लिए कहा। लेकिन ये सभी लोग इस बात से सहमत हैं कि लिट्टे के कुछ सदस्य बदले की भावना के साथ अभी भी फरार हैं, लेकिन यह संगठन अब खुद को खड़ा कर पाने में सक्षम नहीं हो पाएगा।
यहीं पर हूले ने कहा, "सच्चाई यह है कि श्रीलंका सरकार तमिलों की राजनीतिक समस्याओं का समाधान न कर कुछ मायने में तमिल ईलम की ही दिशा में काम कर रही है।"
हूले ने कहा, "तमिल इलाकों में भारी मात्रा में सेना की तैनाती की कोई आवश्यकता नहीं है।"
एक पूर्व महिला लिट्टे कार्यकर्ता ने आईएएनएस से कहा, "इतने वर्षो का संघर्ष बेकार गया। आज हम 1983 (जब तमिल उग्रवाद शुरू हुआ था) से कहीं ज्यादा कमजोर हो गए हैं। मुझे खुद पर और तमिल समुदाय पर दुख होता है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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