लेज़र पचास का हुआ

लेज़र - आधुनिक आविष्कारों में गिनी जानेवाली इस शानदार वैज्ञानिक उपलब्धि का आविष्कार हुए 50 वर्ष हो गए हैं.
ठीक 50 साल पहले 16 मई 1960 को अमरीकी वैज्ञानिक थियोडोर मेमन ने पहली बार कैलिफ़ोर्निया में लेज़र तकनीक का उपयोग दिखाया था.
लेज़र का पूरा नाम है – लाइट एम्प्लिफ़ाइड बाइ द स्टिम्युलेटेड एमिशन ऑफ़ रेडिएशन.
लेज़र किरणों में काफ़ी घनी और शक्तिशाली प्रकाश किरणें निकलती हैं.
थियोडोर मेमन ने महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइन्सटीन के सिद्धांत का उपयोग कर मालिबु में एक प्रयोगशाला में एक मशीन बनाई थी जिससे कि लेज़र किरणें निकलती थीं.
उनका ये आविष्कार आनेवाले समय में विज्ञान की दुनिया का एक क्रांतिकारी आविष्कार बन गया जिसके उपयोगों की गिनती करना मुश्किल है.
उपयोग
आज लेज़र किरणों का प्रयोग हर और देखा जा सकता है – चाहे डीवीडी प्लेयर हों या दूकानों में कीमतों को दर्ज करनेवाले स्कैनर, चाहे अत्यंत जटिल चिकित्सकीय उपकरण हों या फ़ाइबर ऑप्टिक केबल जिनसे इंटरनेट चलता है – ये सब लेज़र किरणों से चलते हैं.
ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्डशर में एक शोध वैज्ञानिक डॉक्टर केट लैंकास्टर कहती हैं कि टेड मेमन अपने आविष्कार के उपयोगों को देखकर निश्चित रूप से फूले नहीं समाते रहे होंगे.
डॉक्टर लैंकास्टर कहती हैं,"मुझे लगता है कि उनके लिए ये कल्पना करना कठिन रहता होगा कि लेज़र के कितने उपयोग हैं. ऐसी चीज़ों से लेकर जिनसे हमारा मनोरंजन होता है, ऐसी चीज़ों तक जिनसे हमारी आँखों का इलाज होता है या फिर ऐसी चीज़ें जिनसे हमारी गाड़ियाँ बनती हैं. लेज़र ने हमारी ज़िंदगी का एक व्यापक हिस्सा बदल दिया है."
विज्ञान की दुनिया में लेज़र किरणों का भविष्य भी बड़ा उज्ज्वल माना जा रहा है.
वैज्ञानिक इनकी सहायता से अणुओं के साथ बदलाव करने, प्रोटीन के बारे में पता लगाने और नाभिकीय विखंडन करने की योजना बना रहे हैं.
ब्रिटेन के साउथैम्प्टन विश्वविद्यालय में ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स रिसर्च सेंटर में प्राध्यापक डॉक्टर डेविड हाना कहते हैं,"लेज़र ने जो कुछ सुविधा उपलब्ध कराई है उससे और क्या-क्या अजूबे काम किए जा सकते हैं इसके लिए लोगों को अपनी कल्पना का प्रयोग करना होगा."
लेज़र के आविष्कारक टेड मेमन ने पाँच मई 2007 को 79 वर्ष की आयु में आँखें मूँदीं.












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