हेपेटाइटिस सी की नई दवा का परीक्षण शुरू

दुनियाभर में करीब 17 करोड़ लोग हेपेटाइटिस सी से संक्रमित हैं। इस संक्रमण से लोगों को लीवर कैंसर और सिरोसिस जैसी बीमारियां हो जाती हैं और इससे मृत्यु तक हो सकती है। पश्चिमी देशों में लीवर प्रत्यारोपण ज्यादा होने की यही वजह है।

वर्तमान में हेपेटाइटिस सी वायरस के संक्रमण को दूर करने के लिए दो दवाओं रीबेविरिन और इंटरफेरोन का इस्तेमाल होता है। ये दवाएं इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं। इन दवाओं के गंभीर दुष्प्रभावों के चलते अक्सर लोग अपना इलाज पूरा नहीं करा पाते हैं।

नई दवा आईएनएक्स-189 इंजेक्शन के जरिए देने की बजाए सीधे मुंह से दी जाती है। सबसे पहले नवंबर 2008 में 'वेल्श स्कूल ऑफ फार्मेसी' ने इस दवा को बनाया था।

प्रयोगशालाओं में हुए प्रयोग बताते हैं कि इस दवा की बहुत कम मात्रा ही 90 प्रतिशत वायरस खत्म कर देती है।

अमेरिकी दवा निर्माता कंपनी इनहिबिटेक्स ने पास आईएनएक्स-189 के लिए लाइसेंस है। कंपनी ने 'वेल्श स्कूल ऑफ फार्मेसी' के एक दल के साथ इस दवा की सुरक्षा जांचने के लिए स्वस्थ लोगों पर इसका प्रयोग शुरू कर दिया है। इस साल के अंत में हेपेटाइटिस सी के मरीजों पर इस दवा का असर देखने के लिए एक परीक्षण किया जा सकता है।

कार्डिफ विश्वविद्यालय के 'वेल्श स्कूल ऑफ फार्मेसी' के प्रोफेसर क्रिस मैकग्विगन का कहना है कि 18 महीने के अंदर ही ये परीक्षण प्रयोगशालाओं से निकलकर मानव पर होने लगेंगे।

कार्डिफ विश्वविद्यालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के मुताबिक आईएनएक्स-189 हेपेटाइटिस के प्रति अधिक कारगर होगी और इसके इस्तेमाल के दुष्परिणाम भी कम होंगे।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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