'कसाब को मृत्युदंड से घावों को भरने में मदद मिलेगी'

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, "हमने गरिमामय तरीके से पूरे मुकदमे को चलाया। 600 से अधिक गवाहों की जांच की और इसे समय से पूरा किया हालांकि कुछ लोगों ने हम पर देरी का आरोप भी लगाया।"

निकम ने कहा, "आतंकवाद किसी मजहब का प्रतिनिधित्व नहीं करता। आतंकवादी पूरी इंसानियत के दुश्मन होते हैं।"

मामले की चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, "इस खुले मुकदमे ने हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को साबित किया है जिसमें अपराधी के पास न्याय के समक्ष खुद का बचाव करने का मौका होता है।"

निकम ने कहा, "मुकदमा 15 अप्रैल 2009 को शुरू हुआ था और केवल सात महीने की सुनवाई के बाद 31 मार्च 2010 को पूरा हो गया। गलत बयान देकर कसाब ने कई बार मामले को प्रभावित करने की भी कोशिश की। मसलन शुरुआत में उसने दावा किया कि वह बालिग नहीं है और हमलों के काफी पहले भारत आया था।"

उन्होंने कहा कि खुद को बचाने के लिए उसने सारे तरीके अपनाए। "जैसे सर्कस में बंदर उछलते हैं वैसे ऊपर-नीचे उछला।"

उन्होंने खुशी जताते हुए कहा, "मैं खुश हूं। कसाब का हिसाब पूरा हो गया।"

कसाब को मौत की सजा के ऐलान के बाद पत्रकारों से चर्चा करने आए निकम बेहद खुश थे। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब वह कैमरों के समक्ष पहुंचें तो अपनी विजयी मुस्कान नहीं छिपा सके और 'विक्ट्री' के संकेतों से उन्होंने इसका प्रदर्शन भी किया।

निकम ने कहा, "फैसले से मैं बहुत खुश हूं क्योंकि पीड़ितों के घाव भरने की मेरी कोशिश सफल हुई है। परिवारों के आंसू पोंछने का काम हमारी पुलिस और अभियोजक एजेंसियों ने किया है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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