सुप्रीम कोर्ट - नार्को टेस्ट 'उसी का जो राजी हो'

Supreme Court Of India
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि "किसी भी व्यक्ति का चाहे वह आरोपी हो या संदिग्ध, उसकी सहमति के बगैर नार्को, पोलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट नहीं कराया जा सकता।"इस फैसले को देने वाली जूरी में देश के मुख्य न्यायाधीश बालकृष्णन , न्यायामूर्ति आरवी रवींद्रन और जेएम पंचाल शामिल थे। न्यायिक पीठ ने अपने इस फैसले में कहा कि बगैर सहमति के इन परीक्षणों का किया जाना व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता में अनुचित दखलंदाजी है।

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अदालत कके मुताबिक बलपूर्वक ऐसे परीक्षण संविधान की धारा 20(3) का उल्लंघन है। इस धारा के तहत किसी भी मामले में किसी भी व्यक्ति को खुद के खिलाफ गवाही देने को विवश नहीं किया जा सकता। इस फैसले में यह भी कहा गया कि यदि कोई व्यक्ति खुद को निरपराध साबित करने के लिए स्वैच्छा से नार्को, पोलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराता है, तो इस परिस्थिति में भी मानवाधिकार आयोग की नियमावली का पालन किया जाना चाहिए।

बालाकृष्णन ने कहा कि ऐसे परीक्षणों के दौरान आरोपी द्वारा अपराध की स्वीकारोक्ति अदालतों में सबूत के तौर पर मान्य नहीं होगी। अंडरवर्ल्ड की दुनिया में गॉडमदर के नाम से मशूहर संतोकबेन जडेजा और माफिया सरगना अरुण गवली ने इन परीक्षणों की वैधता को चुनौती दी थी। दोनों की याचिकाओं पर न्यायालय ने अपना फैसला सुरक्षित रखा है।

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