परमाणु दायित्व विधेयक को लेकर कोई दबाव नहीं : सरकार (लीड-1)
सरकार की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि इस विधेयक पर वर्ष 1998 से ही विचार किया जा रहा था और वर्ष 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते से इसका कोई लेना देना नहीं है।
प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में राज्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान कहा कि यह विधेयक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इसी प्रकार के सर्वश्रेष्ठ विधेयकों की तरह है और यह परमाणु हादसे के पीड़ितों को तत्काल मुआवजा देना सुनिश्चित करेगा।
उन्होंने कहा, "इस विधेयक से मुआवजे के लिए दर-दर की ठोकरें नहीं खानी पड़ेंगी जैसा कि भोपाल गैस कांड में हुआ। यदि पीड़ितों को और अधिक मुआवजा चाहिए तो वे इसके लिए न्यायालय का सहारा ले सकते हैं।"
चव्हाण ने कहा, "यह विधेयक न तो अंतर्राष्ट्रीय दबाब में न ही किसी देश को संतुष्ट करने के लिए सदन में पेश किया गया। मैं अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आरोपों से इंकार करता हूं। विधेयक का भारत-अमेरिका परमाणु समझौते से कुछ भी लेना-देना नहीं है।"
चव्हाण ने कहा कि सरकार इसलिए विधेयक को लाना चाहती है क्योंकि वह स्वच्छ ऊर्जा और बिजली के लिए परमाणु संयंत्रों की स्थापना के प्रति गंभीर है।
"कुल 30 देश परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करते हैं। इनमें से 28 देशों ने पेरिस या विएना सम्मेलनों में परमाणु क्षतिपूर्ति दायित्व को मान लिया था। भारत और पाकिस्तान दोनों में से कोई किसी सम्मेलन के सदस्य नहीं हैं। हमने इस पर बहुत गंभीरता से विचार किया है। हमें या तो अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ जाना होगा या फिर अपने राष्ट्रीय कानून बनाने होंगे।"
'सिविल लाइबिल्टी फॉर न्यूक्लियर बिल, 2010' को अभी संसद में पेश किया जाना है लेकिन विपक्षी दलों के विरोध के कारण इसे सार्वजनिक किया गया है।
विधेयक को 15 मार्च को लोकसभा में पेश करने के लिए सूचीबद्ध किया गया था लेकिन भारतीय जनता पार्टी और वामदलों के दबाव में इसे टाल दिया गया। इसके बाद से सरकार विधेयक पर आम सहमति बनाने का प्रयास कर रही है। विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक में किसी भी परमाणु दुर्घटना के शिकारों को सीमित हर्जाने का ही प्रावधान है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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