पहचान खो रहा है 'कोहबर-सोहराई' कला (फोटो सहित)
पटना, 20 अप्रैल (आईएएनएस)। बिहार और झारखण्ड में कभी मधुबनी पेंटिंग की तरह ही 'कोहबर' और 'सोहराई भित्ती चित्रकला' के प्रति भी लोगों का विशेष झुकाव होता था लेकिन अब यह कला विलुप्त होने के कगार पर है।
झारखण्ड के जनजातीय कला के रूप में पहचाने जानी वाली इस कला का लोग 'वंश वृद्घि' और 'फसल वृद्घि' के रूप में चित्रण करते हैं। बिहार और झारखण्ड के संथाल, मुंडा, गोंड, कोरमा, असुर तथा बैगा जनजातियों द्वारा आज भी इस भित्ती चित्र का बखूबी इस्तेमाल किया जाता है।
परम्परा के मुताबिक इस कला को घर की दीवारों पर उकेरा जाता है। इस कला पर शोध कर रहे विनोद रंजन ने आईएएनएस को बताया कि इसमें मुख्य रूप से दीवारों पर जानवरों के चित्रों को उकेरा जाता है। इस कला के उत्थान के लिए कार्य कर रहे हजारीबाग के बुलु इमाम बताते हैं इस प्राचीन कला की स्थिति वर्तमान समय में काफी दयनीय हो गई है। उन्होंने बताया कि इस कला को हड़प्पा संस्कृति के समकालीन माना गया है।
इमाम ने कहा कि इस कला को किसी के घर विवाह के बाद वंश वृद्घि के लिए तथा दीपावली के बाद फसल वृद्घि के लिए लोग प्रयोग करते हैं। उन्होंने ने कहा कि मान्यता है कि जिस घर की दीवारों पर कोहबर और सोहराई की भित्ती चित्र होते हैं उनके घर में वंश और फसल वृद्घि होते रहती है।
इमाम ने कहा कि फसल वृद्घि के लिये जहां लोग प्राकृतिक वस्तुओं के चित्र बनाते हैं वहीं वंश वृद्घि के लिए दिल, राजा-रानी का चित्र बनाया जाता है। उन्होंने बताया कि इस कला की सबसे विशेषता है कि कलाकार पूरे दीवार पर एक ही बार में चित्र उकेर देते हैं।
हजारीबाग के मांडु की 22 वर्षीया पुतली इस कला में माहिर हैं। उनकी कोहबर और सोहराय पेंटिंग आस्ट्रेलिया की आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथवेल्स सिडनी में वर्ष 2000 में लगाई गई थी और वहां लगने वाली यह पेंटिग भारत की पहली पेंटिंग बनी थी। वह बताती हैं कि पिछले वर्ष मिलान, लंदन, और जर्मनी में भी उनकी पेंटिंग को काफी सराहना मिली थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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