खाड़ी के कफ़ाला क़ानून पर प्रहार

खाड़ी के कफ़ाला क़ानून पर प्रहार

संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार आयुक्त नवी पिल्लई ने खाड़ी के देशों से अनुरोध किया है कि वे कफ़ाला व्यवस्था यानि आप्रवासी कामगरों के लिए स्थानीय प्रायोजक के चलन को ख़त्म करें.

कफ़ाला वो क़ानून है जिसके तहत विदेशों से आए कामगरों को स्थानीय प्रायोजक के बग़ैर रोज़गार नहीं मिल सकता.

सऊदी अरब की अपनी पहली यात्रा के दौरान नवी पिल्लई ने ये वक्तव्य दिया.

उनका कहना था कि स्थानीय प्रयोजन की इस व्यवस्था के तहत दुर्व्यवहार को बढ़ावा मिलता है, "कुछ देश आप्रवासियों के लिए स्थानीय प्रायोजन यानि कफ़ाला की व्यवस्था पर पुनर्विचार कर रहे हैं. नियोक्ता के रहमो करम पर रखने वाली इस व्यवस्था के तहत मालिक ये समझते हैं कि वे अपने कामगरों से दुर्व्यहार कर सकते हैं जबकि कामगर न तो कोई दूसरी नौकरी कर सकता है और न ही देश छोड़ कर जा सकता है."

नवी पिल्लई ने जद्दा के किंग अब्दुल्ला विश्वविद्यालय में एक भाषण के दौरान ये वक्तव्य दिया.

नवी पिल्लई ने कहा, “मैं इस व्यवस्था पर पुनर्विचार कर रहे देशों का पूरा समर्थन करती हूं और अन्य देशों से अनुरोध करती हूं कि वे कफ़ाला की जगह आधुनिक श्रम क़ानून लागू करें, जो अधिकार और कर्तव्य में सही संतुलन रखने के लिए बनाया गया है.”

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त ने इस बात को भी रेखांकित किया कि खाड़ी के देशों में कम से कम 12 लाख आप्रवासी कामगर, ख़ासतौर पर घरों में काम करने वालों के पास्पोर्ट ज़ब्त कर लिए जाते हैं, उन्हें वेतन नहीं दिया जाता और उनके साथ दुर्वयव्हार किया जाता है.

नवी पिल्लई का कहना था, “आप्रवासी घरेलू कामगरों की स्थिति विशेष तौर पर चिंताजनक है क्योंकि घरों में काम करने के कारण ये अकेले पड़ जाते हैं और अक्सर इन्हें शारीरीक, मानसिक और यौन दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ता है.”

पिल्लई ने कहा कि ये ज़रूरी है कि अप्रवासन नीतियों का निर्धारण करते समय सरकारें मानवाधिकारों का ख़याल रखें.

महिला अधिकार

नवी पिल्लई ने महिलाओं के अधिकारों का सवाल उठाते हुए खाड़ी देशों से अनुरोध किया, कि वे महिलाओं को अपने जीवन की बागडोर ख़ुद संभालने का मौक़ा दें.

अपने भाषण में नवी पिल्लई ने कहा कि महिलाओं को आज भी काम पर जाने या डॉक्टर के पास जाने के लिए भी अपने पुरुष संरक्षक की अनुमति लेनी पड़ती है.

अपने पति के बग़ैर उन्हें बैंकों में प्रवेश नहीं दिया जाता. यहां तक कि अगर वे खाता खुलावाना चाहें तो निजी खाता नहीं बल्कि पति के साथ ही संयुक्त खाता खुलावाना पड़ता है.

सऊदी अरब के कामकाजी समाज मे महिलाओं का आंकड़ा केवल 5 प्रतिशत है.

सऊदी अरब में महिलाओं को मतदान का अधिकार नहीं है.

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