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बनारस के घाटों से गायब होतीं छतरियां

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    वाराणसी, 19 अप्रैल (आईएएनएस)। धार्मिक नगरी काशी (बनारस) में गंगा घाटों से बांस की छतरियां (छत्र) अब धीरे-धीरे लुप्त होने लगी हैं।

    सैकड़ों वर्षो से पेंटिंग्स, रेखाचित्रों और छायाचित्रों में काशी की जो छवि प्रस्तुत की जाती रही है, उसमें बांस की छतरियों को प्रमुख स्थान हासिल रहा है। इन्हीं छतरियों के नीचे बैठकर पंडे-पुरोहित धार्मिक कर्मकांड संपादित करते रहे हैं।

    बनारस हिंदू विश्वविद्यालय(बीएचयू) द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार काशी के 250 से ज्यादा घाटों पर केवल 130-140 छतरियां ही बची हैं। इससे ज्यादा चिंता की बात यह है कि पूरे काशी में केवल अब एक ही परिवार बचा है, जो इन बांस की छतरियों को बनाता है।

    बीएचयू के कला एवं इतिहास विभाग के प्रोफेसर कल्याण कृष्णा ने आईएएनएस से कहा कि समूचे विश्व में काशी की सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली गंगा घाटों की छतरियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं।

    कृष्णा कहते हैं कि अगर छतरियों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया तो अगले छह-सात सालों में ये इतिहास का हिस्सा बन जाएंगी।

    जानकारों के मुताबिक हाल के वर्षो में सांस्कृतिक विरासत के प्रति तीर्थयात्रियों की उदासीनता के कारण गंगा घाटों से ये छतरियां गायब होती जा रही हैं।

    कृष्णा कहते हैं कि पुराने समय में धनाढ्य तीर्थयात्री, श्रद्धालु और दानदाता धार्मिक कर्मकांड के बाद नई छतरियों के लिए आर्थिक दान देते थे, लेकिन समय के साथ यह परंपरा समाप्त हो गई। तीर्थयात्रियों ने आर्थिक दान देना लगभग बंद कर दिया, जिसका सीधा असर छतरियों पर पड़ा है।

    शोधकर्ताओं के मुताबिक छतरी की कीमत आज 2,000 हजार रुपए पड़ती है। तीर्थयात्रियों की उदासीनता के कारण कोई पंडा अब इतनी राशि खर्च करने के लिए तैयार नहीं है। मांग न होने के कारण छतरी बनाने वाले कारीगर कोई अन्य धंधा तलाश रहे हैं।

    घाटों की सदियों पुरानी परंपरागत शोभा कायम को करने और बांस की छतरियों के लिए कृष्णा ने अपने शोधकर्ता दल के साथ धन इकट्ठा करने का अभियान चलाया है।

    दल के एक सदस्य आर. कुमार ने कहा कि धन एकत्र करने के लिए हमने कई अलग-अलग दल बनाया है। एकत्र धन का इस्तेमाल छतरियों के लिए होगा।

    कुमार के मुताबक कई विदेशी भी उनके अभियान में शामिल हो गए हैं।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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