'कैम्पा योजना' से दावानल रोकने की कोशिश
कुल 873 करोड़ रुपये की इस कैम्पा योजना के प्रथम चरण के लिए 81 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त हो चुकी है। पहाड़ों के लिए अभिशाप बन चुके चीड़ के पेड़ों से निजात पाना तो आसान नहीं है, परन्तु वन विभाग इन पेड़ों से होने वाले नुकसान को कम करने के साथ ही इसे आजीविका का साधन बनाने के बारे में सोच रहा है।
वन विभाग की यह योजना यदि सफल हो गई तो आने वाले दिनों में जंगलों में लगने वाली भीषण आग को भी रोका जा सकेगा।
उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड के पहाड़ी जंगलों में पिछले कुछ दशकों से चीड़ के पेड़ बुरी तरह फैल गए हैं। चीड़ के पेड़ों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कम नमी वाले क्षेत्रों में भी ये खड़े हो जाते हैं। इसी खूबी को देखते हुए किसी समय इस पेड़ की प्रजाति को यहां के जंगलों में खास तौर पर उगाया गया था।
इस पेड़ से प्राप्त होने वाली लकड़ी जहां भवन निर्माण के लिए उपयुक्त थी, वहीं इससे मिलने वाला लीसा भी वन विभाग की आय को बढ़ा रहा था। लीसा को लेकर तो पौड़ी व कुमाऊं के सीमा पर बसे क्षेत्रों में रामगंगा परियोजना तक शुरू की गई। इस परियोजना का उद्देश्य लीसा से आय प्राप्त कर वन पंचायतों व सरकार की आमदनी बढ़ाना था।
वन विभाग की यह परियोजना तो सफल नहीं हो पाई, परन्तु इसके दुष्परिणाम जरूर सामने आए हैं। जिन स्थानों पर चीड़ ने अपनी जड़ें जमाई है, उस पूरे क्षेत्र से अन्य वनस्पति का नामोनिशान मिट गया है। चीड़ के पेड़ से झड़ने वाली पत्तियां, जिन्हें पिरूल कहा जाता है, आग की एक बड़ी कारक बनीं। आसानी से आग पकड़ लेने के कारण पिरूल एक बड़ी मुसीबत के रूप में सामने आई है।
वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं से वन महकमा बुरी तरह परेशान है। जंगलों की आग को बचाने की मुहिम पर अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पाए हैं। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर वन विभाग अब कैम्पा योजना शुरू करने जा रहा है।
योजना के तहत जलस्रोतों का पुनर्जीवन, जलसंरक्षण व पिरूल से कोयला निर्माण का कार्य प्रस्तावित है। जंगलों में फैले पिरूल को ग्रामीणों से एकत्रित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसका उपचार कर इससे कोयला बनाया जाएगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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