'नक्सली और पुलिस के बीच फंसे हैं हम'
दंतेवाड़ा, 13 अप्रैल (आईएएनएस)। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में नक्सलियों के अब तक के सबसे भीषण हमले की घटना के एक हफ्ते गुजर जाने के बाद यहां के जनजातियों को इस बात भय है कि कहीं यह इलाका, जिसे वे सदियों से अपना घर कहते रहे हैं, 'युद्ध क्षेत्र' में तब्दील न हो जाए।
दंतेवाड़ा जिले में हुए नक्सली हमले में 76 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे। बस्तर क्षेत्र के अशांत माने जाने वाले इस इलाके में हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। जनजातियों को भय है कि यहां सुरक्षाकर्मियों और नक्सलियों के बीच संघर्ष न छिड़ जाए।
दंतेवाड़ा जिले के भुसारास गांव के लोखान सोधी (58 वर्ष) ने आईएएनएस से कहा, "छह अप्रैल को हुए नक्सली हमले के बाद बस्तर के ग्रामीण इलाकों में हर कोई आंतक के साये में जी रहा है। अपने परिवार के साथ शांति पूर्वक रहना हमारे लिए सपना बन गया है।"
सोधी ने कहा, "वर्ष 1980 से ही हम भय के साये में जी रहे हैं। वर्ष 1980 में दादा (नक्सली) आंध्र प्रदेश से बस्तर क्षेत्र में दाखिल हुए थे।"
बस्तर क्षेत्र में पांच जिले आते हैं, जिसमें कांकेर, नारायणपुर, बस्तर, बीजापुर और दंतेवाड़ा शामिल है। यह क्षेत्र 40,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जहां 35 लाख लोग रहते हैं। इनमें लगभग 80 फीसदी जनजातीय हैं।
अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के अध्यक्ष मनीष कुंजाम ने कहा, "बस्तर के दूरदराज के इलाके अब युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गए हैं। लगभग एक लाख जनजातीय लोग पुलिस और नक्लसलियों के बीच फंसे हैं। दुर्भाग्य की बात है कि अभी तक इसका समाधान नहीं निकल सका है।"
दंतेवाड़ा के जगरगुंडा इलाके के पूरियम बोजे (39 वर्ष) ने कहा, "हमारे लिए जिंदगी एक बुरे सपने की तरह बन गई है। हम दादा और पुलिसकर्मियों के बीच फंसे हुए हैं। हमें न कभी भी सरकार की ओर से न दादा की ओर से सहायता मिली है। हम तो बस यही प्रार्थना करते हैं कि हमें शांतिपूर्वक जीने दिया जाए।"
छत्तीसगढ़ पुलिस के आंकड़ों के अनुसार यहां लगभग 50,000 नक्सली रह रहे हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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