यूपी में श्मशान घाट बना पर्यटक स्थल!

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गोरखपुर। श्मशान घाट का जिक्र मात्र लोगों का मन विचलित कर देता है लेकिन उत्तर प्रदेश का एक श्मशान घाट पर्यटन और पिकनिक का केंद्र बनकर उभर रहा है। यहां लोग भारी संख्या में सपरिवार पिकनिक मनाने आते हैं।

गोरखपुर जिले के बड़हलगंज कस्बे में सरयू नदी के तट पर स्थित 'मुक्तिपथ' श्मशान घाट अपनी सुंदरता के कारण सैकड़ों लोगों का मन मोह रहा है। हरे भरे घास के मैदान, फूलों के बगीचे, खूबसूरत पौधे, पानी के फव्वारे, कृतिम गुफाएं और भगवान शिव की विशालकाय 62 फुट की मूर्ति इसके मुख्य आकर्षण हैं, जो लोगों को अपनी तरफ खींचते हैं।

मुक्तिपथ के सचिव एवं पेशे से व्यवसायी लक्ष्मी नारायण गुप्ता ने कहा कि 3.5 एकड़ क्षेत्र में फैला यह श्मशान घाट अपने नैसर्गिक सौंदर्य से हर रोज सैकड़ों को अपनी तरफ आकर्षित करता है। आज यह पिकनिक मनाने वालों का पसंदीदा स्थल बन गया है।

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गुप्ता के मुताबिक हर रोज यहां घूमने-फिरने के उद्देश्य से करीब 700 से 800 आगंतुक आते हैं। अगर शवों का अंतिम संस्कार करने आने वालों की संख्या जोड़ दी जाए तो कुल संख्या 1,000 से ऊपर पहुंच जाती है। दिलचस्प बात यह है कि जो श्मशान घाट आज अपनी सुंदरता से लोगों को अपनी तरफ खींचता है, वहीं पर कुछ समय पहले लोग जाने से डरते थे। विगत 40-45 सालों से लोग यहां सरयू नदी के किनारे शवों का अंतिम संस्कार करने आते रहे हैं।

करीब नौ साल पहले इस शमशान घाट में बदलाव की शुरुआत हुई। स्थानीय लोगों ने, खासकर व्यापारियों ने इस श्मशान घाट का कायाकल्प करने का सोचा। मुक्तिपथ के कोषाध्यक्ष मुकेश उमर ने कहा कि हमारा मकसद श्मशाम घाट को थोड़ा ठीक ठाक करके व्यवस्थित बनाना था। उस समय हमें वास्तव में यह पता नहीं था कि हमारा प्रयास इसे पिकनिक स्थल में बदल देगा।

उमर के मुताबिक वर्ष 2001 में पहली बार श्मशान घाट के कायाकल्प के लिए तकरीबन आठ लाख रुपये इकट्ठा हुआ। उस धन से शवों को जलाने के लिए नदी के किनारे प्लेटफार्म बनाकर उनके ऊपर टिन की चादर लगाई गई। इसके अलावा शोक संतप्त लोगों के बैठने के एक एक कक्ष का निर्माण किया गया। 2001 में शुरू हुआ धन इकट्ठा करने का सिलसिला आज भी जारी है। इस श्मशान घाट की तस्वीर बदल गई है। इसके निर्माण के लिए हर क्षेत्र के लोगों ने सहयोग किया।

आज मुक्तिपथ सोसाइटी में करीब 60 से ज्यादा सदस्य हैं, जो मुक्तिपथ के लिए कार्ययोजना बनाने के साथ इसके रख रखाव का काम देखते हैं। सदस्यों में ज्यादातर स्थानीय व्यवसाई, दुकानदार, चिकित्सक, शिक्षक व अन्य क्षेत्रों के लोग शामिल हैं। गुप्ता कहते हैं कि हमें किसी भी तरह की सरकारी मदद नहीं मिलती है। यहां का सारा रख रखाव और सौंदर्यीकरण स्थानीय लोगों द्वारा इकट्ठा किए गए धन से होता है। वर्तमान में हम इस श्मशान घाट के रखरखाव पर 1 लाख रुपये मासिक खर्च करते हैं।

मुक्तिपथ सोसाइटी के सदस्यों के मुताबिक जल्द ही यहां पर एक ध्यान कक्ष, एक अतिथि गृह और एक अत्याधुनिक रेस्तरां खोला जाएगा, जिससे और ज्यादा लोग आकर्षित होंगे। मुक्तिपथ में आने वाले लोगों के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। इसके आलावा सोसाइटी उन लोगों से भी कोई शुल्क नहीं लेती जो यहां सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। एक निजी स्कूल में शिक्षक विष्णु अग्रहरि कहते हैं कि विशेष रूप से गरीब लोग यहां पर शादी, मुंडन, तिलक व अन्य शुभ समारोह आयोजित करते हैं।

मुक्तिपथ न केवल गोरखपुर के लोगों के बीच, बल्कि आस-पास के जिलों देविरया, मऊ, बस्ती, कुशीनगर, महराजगंज और बलिया में बहुत लोकप्रिय हो गया है। कुशीनगर में एक निजी टेलीफोन कंपनी में काम करने वाले अतुल पांडे कहते हैं कि मैं महीने में कम से कम दो बार पूरे परिवार के साथ मुक्तिपथ पहुचता हूं। मेरे बेटे को यह स्थान बहुत पसंद है। वह हर अक्सर रविवार को मुक्तपथ की जिद करता है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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