नई सड़कें : कहीं मौक़ा कहीं मुसीबत

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ब्रजेश उपाध्याय

हाइवे हिंदुस्तान से

सासाराम के पास चार लेने हाइवे के ठीक कंधे पर बैठी हुई है पांच सौ लोगों की एक बस्ती.

बाहर लगे एक आइसक्रीम के ठेले के इर्द गिर्द बच्चों की भीड़ है. चार क़दम दूर गांव के मर्द और औरत अलग-अलग टोलियों में बैठे हुए हैं. दिन का समय है...आमतौर पर लोगों को काम पर होना चाहिए...लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं है.

मौकों की खान कही जानेवाली इस सड़क के पास इतनी मायूसी क्यों?

जवाब दिया लगभग 50 साल के गौरी बोले ने जो साठ से उपर के नज़र आते हैं.

उनका कहना है, "सब कुछ इस सड़क की वजह से है. इसने हमसे रोज़ी रोटी छीन ली."

उन्होंने बताया कि इस चार लेन की सड़क से पहले कोल आदिवासियों की ये पूरी बस्ती सड़क के उस पार मौजूद पहाड़ों को तोड़कर रोज़ी रोटी कमाती थी.

लेकिन पहाड़ों को ब्लास्ट करने पर बड़े बड़े चट्टान सड़क पर गिर सकते थे और सरकार ने उस पहाड़ पर काम करने पर रोक लगा दी.

वहां से कुछ ही दूरी पर एक दुर्गा मंदिर भी है लेकिन इनका कहना है कि ये लोग वहां भी दुकान नहीं खोल सकते क्योंकि उनके पास इस बात का कोई प्रमाण पत्र नहीं है कि वो स्थानीय निवासी हैं.

गौरी बोले ने बताया कि दशकों पहले उनके दादा परदादाओं को ठेकेदार यहां मध्यप्रदेश से लेकर आए थे बंधुआ मज़दूरों की तरह.

जब उन्हें मुक्ति मिली तो बिहार सरकार ने उन्हें मध्यप्रदेश भेजने की कोशिश की लेकिन वहां की सरकार ने भी उन्हें अपनाने से इंकार किया और बिहार सरकार इन्हें फिर वापस ले आई.

इन्हें इंदिरा आवास योजना की तहत मकान भी मिले और पट्टे पर पहाड़ मिला काम करने को. लेकिन इनमें से अब ज़्यादातर ऐसे हैं जिनके पास जाति प्रमाण पत्र नहीं है और इनका कहना है कि उन्हें काम नहीं मिल सकता.

स्थानीय लोगों का कहना है कि मुश्किलें इसलिए भी हैं क्योंकि बहुत से लोग कोल आदिवासियों के नाम पर प्रमाण पत्र लेना चाहते हैं जिससे उन्हें आरक्षण और अन्य सुविधाएं मिल सकें और इसलिए ये दिक्कतें आ रही हैं.

सरकारी पेचीदगियां जो भी हों लेकिन सच्चाई यही है कि इन्हें अब रोज़ी रोटी के लिए काफ़ी दूर जाना पड़ता है.

कहानी केसरी परिवार की

समय इस बस्ती के ख़िलाफ़ है, सड़क की रफ़्तार उनके लिए बहुत तेज़ और भविष्य का कोई अता पता नहीं. लेकिन इसी बस्ती से मुश्किल से सौ मीटर की दूरी पर है केसरी परिवार.

सड़क ने उनकी रोज़ी रोटी भी ठप्प की थी, लेकिन उन्होंने उस मुसीबत को मौके में बदलने की कोशिश की है.

केसरी परिवार सासाराम के जीटी रोड पर बारह सालों से एक ढाबा चलाता था. आमदनी इतनी की अच्छे से गुज़ारा हो जाए, तीन बेटियों की शादी भी अच्छे से हुई.

लेकिन फिर चार लेनों वाला स्वर्णिम चतुर्भुज जीटी रोड को परे धकेलता हुआ थोड़ी दूर से निकल गया. अब ट्रक डाइवर इस सड़क से नहीं गुज़रते और ढाबे पर बस इक्का दुक्का लोग आते थे. धंधा ठप्प होने की कगार पर आ गया.

विकल्प दो ही थे...बैठकर किस्मत को कोसते रहें या फिर से उठकर खड़े होने की कोशिश करें. इस परिवार ने दूसरा रास्ता चुना.

उन्होंने चार लेन की हाइवे के ठीक किनारे एक ज़मीन का टुकड़ा लीज़ पर ले लिया और फिर शुरू किया एक नया ढाबा..

परिवार के मुखिया सीताराम केसरी कहते हैं, "मैं और मेरे पांच बेटे जी जान से खट रहे हैं. अभी कम गाड़ियां रूकती हैं...आमदनी दिन भर की बस हज़ार रूपए है लेकिन उम्मीद है कि हालात बेहतर होंगे."

पहले उनकी हर दिन की कमाई चार हज़ार रूपए की थी.

उनका एक लड़का ज्योति केसरी आईएससी पास कर चुका है, दिनभर ढाबे में रोटियां सेंकता है और फिर शाम में ट्यूशन भी पढ़ाता है.

ज्योति का कहना है, "मुझे आगे पढ़ना है जिससे मैं परिवार का नाम रौशन कर सकूं लेकिन अगर कहीं नौकरी नहीं मिली तो फिर इसी ढाबे को आगे बढाएंगे.’’

अप्रैल में ज्योति केसरी इन्हीं सड़कों से होता हुआ पटना जा रहा है फ़ौज में भर्ती के लिए इंटरव्यू देने.

नहीं पता ये सड़के उसे अपने सपने की ओर ले जाएंगी या फिर इसी ढाबे पर वापस लाएंगी. लेकिन उसकी आंखों की चमक ये उम्मीद ज़रूर दिलाती है कि वो जब भी गिरेगा, उठेगा ज़रूर.

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