मज़दूरों की दुर्दशा की फ़िक्र किसे

मज़दूरों की दुर्दशा की फ़िक्र किसे

विनीत खरे
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान चल रहे कामों में लगे मज़दूरों की हालत पर न्यायालय में एक निगरानी रिपोर्ट पेश की गई है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ज़्यादातर को पूरी मज़दूरी नहीं मिलती, साप्ताहिक छुट्टी नहीं मिलती, मज़दूरी की पर्ची नहीं मिलती और स्वास्थ्य सुविधाओं की भी कमी है.

दरअसल इन मज़दूरों के हालत पर दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की गई थी जिस पर न्यायालय ने एक निगरानी समिति का गठन किया था.

समिति के सदस्यों ने कार्यस्थलों का दौरा कर ये रिपोर्ट तैयार की है. समिति की रिपोर्ट के मुताबिक़ मज़दूरों के पास सुरक्षा उपकरण नहीं हैं, जब उन्हें जूते दिए जाते हैं तो उसके पैसे काट लिए जाते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि क़रीब-क़रीब हर कार्यस्थल से दुर्घटना की ख़बर है, हालांकि रिपोर्टों की पुष्टि नहीं हो सकी है.

निगरानी समिति का कहना है कि ज़्यादातर मज़दूर गंदगी में रहते हैं और वो कई कमियों से दो-चार हैं. बीबीसी से बात करते हुए कई मज़दूरों ने शिकायत की कि उन्हें शौचालय के लिए झाड़ियों का रुख करना पड़ता है और उनके बच्चों की शिक्षा और देखरेख की कोई व्यवस्था नहीं है.

महिला मज़दूरों का कहना है कि उनकी परेशानी पुरुषों से ज़्यादा है और उन्हें पानी लाने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता है. तीन याचिकाकर्ताओं में से एक, निर्माण मज़दूर पंचायत संगम के सुभाष भटनागर कहते हैं कि सबसे बड़ी समस्या ये है कि ज़्यादातर मज़दूरों को बिल्डिंग ऐंड अदर कंस्ट्रक्शन वर्कर्स, रेग्यूलेशन ऐंड कंडीशंस ऑफ़ सर्विस, एक्ट 1996 के बारे में जानकारी ही नहीं है.

इस कानून के अंतर्गत मज़दूरों की सुरक्षा और उनके भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं. जानकारी के अभाव की वजह से ज़्यादातर मज़दूर इस एक्ट के अंतर्गत रजिस्टर्ड ही नहीं हैं और ना ही उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी है. सुभाष भटनागर कहते हैं कि दरअसल जो करोड़ो रुपए मज़दूरों की देखभाल, उनके भविष्य पर ख़र्च होना चाहिए था, उसका ग़लत इस्तेमाल हो रहा है.

रिपोर्ट में सिफ़ारिश की गई है कि सभी मुख्य नियोक्ताओं, ठेकेदारों से कहा जाए कि वो इस बारे में तुरंत क़दम उठाएं ताकि मज़दूरों को न्यूनतम मज़दूरी मिले, जहाँ कहीं हो सके उनकी मज़दूरी बैंक अकाउंट में जमा हो, जिस हालात में वो रह रहे हैं तो उसमें सुधार हो और जो क़ानून का उल्लंघन करें, उन पर क़ानूनी कार्रवाई हो.

निगरानी कमेटी के सदस्य लक्ष्मीधर मिश्रा ने बीबीसी को बताया कि हालांकि राष्ट्रमंडल खेल ज़्यादा दूर नहीं हैं फिर भी समिति की सिफ़ारिशों के मुताबिक़ मज़दूरों को राहत देना संभव है. उन्होंने कहा कि जानकारी होते हुए भी लोग क़ानून का उल्लंघन करते हैं. इसमें अर्थनीति भी कारण है यानी मुनाफ़े के लिए लोगों का शोषण.

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