ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता विंदा करंदीकर नहीं रहे (लीड-2)
करंदीकर के बेटे उदय करंदीकर ने आईएएनएस को उनके निधन के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उनके पिता ने रविवार को बांद्रा पूर्व स्थित गुरु नानक अस्पताल में अंतिम सांस ली। करंदीकर का पार्थिव शरीर उनके आवास 'साहित्य सहवास' पर अंतिम दर्शन के लिए रखा गया है।
उदय ने कहा, "पिताजी की इच्छा के अनुसार उनका पार्थिव शरीर सर जे. जे. अस्पताल को दान कर दिया जाएगा।"
महाराष्ट्र के राज्यपाल के.शंकरनारायणन ने करंदीकर के निधन पर शोक जताया है। उन्होंने करंदीकर को 'साहित्य जगत का चमकीला सितारा करार दिया।'
मुख्यमंत्री अशोक चह्वाण ने भी करंदीकर के निधन पर शोक जताया है। उन्होंने कहा, "करंदीकर के निधन से मराठी साहित्य का एक युग खत्म हो गया।"
साहित्य जगत में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए करंदीकर को ज्ञानपीठ पुरस्कार के अलावा जनस्थान पुरस्कार, कबीर सम्मान, कोणार्क पुरस्कार, सीनियर फुलब्राइट अवार्ड, सोवियत लैंड नेहरु लिटरेरी अवार्ड और साहित्य अकादमी फेलोशिप जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था।
कंरदीकर के मशहूर काव्य संग्रहों में 'श्वेत गंगा', 'धृपद', 'जातक' और 'अष्टदर्शन' शामिल है। इसके अलावा उन्होंने बच्चों के लिए कई कविताएं भी लिखीं, जिसमें प्रमुख रूप से 'एटू लोकांच देश' शामिल है। साथ ही वह ललित निबंध लिखा करते थे।
कवि और निबंधकार के अलावा करंदीकर एक अच्छे अनुवादक भी थे। उन्होंने कई अंग्रेजी पुस्तकों का मराठी में अनुवाद किया था। वह अंग्रेजी में समीक्षाएं भी लिखा करते थे।
करंदीकर का जन्म 23 अगस्त 1918 को सिंधुदुर्ग जिले के खंडलाव गांव में हुआ था। उन्हें वर्ष 2003 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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