आर्थिक समीक्षा : महंगाई, पर विकास के रास्ते पर सरपट दौड़ेगी अर्थव्यवस्था (राउंडअप)
आम बजट से पूर्व गुरुवार को लोकसभा में पेश 'आर्थिक समीक्षा 2009-10' के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में विकास की दर 7.2 फीसदी और वर्ष 2011-12 में यह दर नौ फीसदी से अधिक हो जाएगी। समीक्षा में कहा गया है कि अगले चार वर्षो में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन सकती है।
समीक्षा में कहा गया है, "संकट से पूरी तरह उबरने के बाद देश की अर्थव्यवस्था 8.5 फीसदी की दर से बढ़ेगी। इसमें 0.25 फीसदी का उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है।"
समीक्षा में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने और कृषि क्षेत्र में चार फीसदी की विकास दर हासिल करने के लिए गंभीर नीतिगत कदम उठाने की जरूर बताई गई है।
खाद्यान्नों की महंगाई पर चिंता जाहिर करते हुए इस दिशा में सरकार की परोक्ष तौर आलोचना की गई है और कहा गया है कि देश में अनाज की कोई कमी नहीं है। केंद्रीय भंडार में जनवरी 2010 में चावल 2.43 करोड़ टन और गेहूं 2.31 करोड़ टन था। बफर मानकों के मुताबिक स्टॉक में 1.18 करोड़ टन चावल और 82 लाख टन गेहूं होना चाहिए।
समीक्षा के मुताबिक कुछ ऐसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि को भी हवा दी जा सकती है जिनका पर्याप्त भंडार है। इसमें कहा गया है, "जहां तक वर्तमान स्थिति का सवाल है तो आपूर्ति दबाव के कारण महंगाई में वृद्धि हुई है।"
बेमेल आपूर्ति से निपटने के लिए विभिन्न स्थानों पर पर्याप्त और समय से इन सामानों की आपूर्ति वास्तविक चुनौती है।
समीक्षा के अनुसार यद्यपि प्रति हेक्टेयर उत्पादन में सुधार हुआ है लेकिन यह बढ़ती जनसंख्या, खासकर जब आय स्तर भी बढ़ रहा है, की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं है। कृषि उत्पादन में वांछनीय वृद्धि नहीं हो रही है इसलिए अनुसंधान और बेहतर कृषि प्रक्रियाओं पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है।
दालों तथा तिलहनों के कम उत्पादन पर चिंता जताते हुए कहा गया कि दाल उत्पादक देशों की संख्या सीमित होने के कारण उनके आयात की संभावना भी सीमित है। इसके कारण इनकी कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है।
कृषि विकास दर वर्ष 2009-10 में 0.2 फीसदी रहने की उम्मीद है जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 1.6 फीसदी थी।
समीक्षा में गरीबी कम करने को प्रमुख चुनौती बताते हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नए मॉडल की चर्चा है।
समीक्षा के अनुसार, "दुर्भाग्य से गरीबी के मोर्चे पर देश को अभी काफी रास्ता तय करना है। योजना आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञ समूह की हाल की रिपोर्ट (तेंदुलकर रिपोर्ट के नाम से भी प्रसिद्ध) में देश की कुल गरीबी 37.2 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है।"
समीक्षा ने के अनुसार मौजूदा व्यवस्था में पीडीएस स्टोर-कीपर सब्सिडीयुक्त अनाज को खुले बाजार में बेच देते हैं और फिर शेष अनाज में मिलावट करते हैं और इस घटिया उत्पाद को गरीबी रेखा से नीचे और गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों को बेच देते हैं जिन्हें इस मामले में कोई विकल्प प्राप्त नहीं होता है।
इन कमियों को दूर करने के लिए "परिवर्तित प्रणाली की रूपरेखा" सामने रखते हुए समीक्षा में कहा गया है, "इस प्रणाली के दो आधार हैं- (1) सब्सिडी सीधे गरीब परिवारों को दी जाए बजाय इसके कि पीडीएस स्टोर कीपरों को सस्ते अनाज के रूप में दी जाए और फिर वह इसे जरूरतमंद परिवारों को दें और (2) इन परिवारों को किसी भी स्टोर से खाद्यान्न खरीदने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
नई प्रणाली के अंतर्गत पीडीएस स्टोरों को सब्सिडीयुक्त दर पर कोई अनाज नहीं दिया जाएगा और वे अनाज बेचते समय बाजार मूल्य लेने के लिए स्वतंत्र होंगे, भले ही ग्राहक कोई भी हो। एक मात्र परिवर्तन यही है कि पीडीएस स्टोरों को अब ये कूपन स्वीकार करने की अनुमति दी जाएगी जो वे स्थानीय बैंक में ले जा सकते हैं और उसके बदले में धनराशि ले सकते हैं और बैंक आगे सरकार के पास जाएंगे और बदले में पैसा ले सकेंगे। इसके अतिरिक्त, जिन परिवारों को ये कूपन मिलेंगे, उन्हें अपनी पसंद के पीडीएस स्टोर में जाने की अनुमति होनी चाहिए।
समीक्षा के मुताबिक विकास दर में आई बढ़ोतरी से दिसंबर 2008 के बाद दिए गए 37 अरब डॉलर के वित्तीय प्रोत्साहनों की क्रमिक वापसी का मार्ग साफ हो गया है।
इसमें कहा गया है, "व्यापक राजकोषीय घाटे, अर्थव्यवस्था में सुधार के स्तर और वित्तीय प्रोत्साहन के बगैर सुधार में स्थायित्व को देखते हुए धीरे-धीरे वित्तीय समेकन की प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत है।"
साथ ही समीक्षा में निर्यात क्षेत्र को और अधिक प्रोत्साहन देने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। हालांकि इसमें कहा गया है कि वर्ष 2010 में दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में सुधार के संकेतों को देखते हुए निर्यात में भी सुधार की संभावना है।
समीक्षा में कहा गया है, "विश्व व्यापार में सुधार की संभावना को देखते हुए वर्ष 2010 में देश के व्यापार क्षेत्र का परिदृश्य बेहतर दिख रहा है। अल्प अवधि में राहत और प्रोत्साहन पैकेज का असर पड़ा है, लेकिन नीतियों में कुछ आधारभूत परिवर्तन की जरूरत है। निर्यात सेक्टर के लिए सीमा शुल्क को 10 फीसदी से घटकर 7.5 फीसदी करने की जरूरत है।"
इसके अलावा इसमें इंदिरा आवास योजना का लक्ष्य दोगुना किए जाने का प्रस्ताव रखा गया।
वर्ष 2005-06 से 2008-09 तक चार वर्षो की अवधि के दौरान इंदिरा आवास योजना के तहत 60 लाख मकानों के निर्माण पर विचार किया गया था, जबकि इस लक्ष्य की तुलना में 71.76 लाख मकानों का निर्माण किया गया। इसमें चालू वित्तीय वर्ष 2009-10 से लेकर अगले पांच वर्षो में 120 लाख मकानों के निर्माण का लक्ष्य रख तय किया जाना चाहिए।
देश के उद्योग जगत के लिए आधारभूत संरचनाओं विशेषकर ऊर्जा और सड़क की कमी को सबसे बड़ी बाधा बताते हुए समीक्षा में कहा गया है कि अप्रैल-नवंबर 2009-10 के दौरान औद्योगिक उत्पादन में 7.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश कर रहे औद्योगिक क्षेत्र ने दिसंबर में 16.8 फीसदी की वृद्धि दर्ज की जो पिछले एक दशक में सबसे तेज बढ़ोतरी थी। इसके अलावा विनिर्मित वस्तु क्षेत्र में शानदार 18.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
वैश्विक मंदी के बावजूद देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अप्रैल-नवंबर 2009-10 के दौरान कुल 93,354 करोड़ रुपये रहा जबकि 2008-09 के इसी अवधि में यह 85,700 करोड़ रुपये था।
समीक्षा में 13वें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार किए जाने की वकालत करते हुए कहा गया है कि सामाजिक क्षेत्र संबंधी अधिकांश विषय राज्यों के अधिकार क्षेत्र में होने के बावजूद सामाजिक सेवाओं और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में केंद्र सरकार की मदद बढ़ी है। इसमें स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेश निवेश के नियमों को उदार बनाने पर जोर दिया गया है।
समीक्षा में बजटीय अनुमान के अनुसार 2,82,735 करोड़ रुपये का घाटा दर्शाया गया है। अप्रैल से दिसंबर 2009-10 के दौरान राजस्व प्राप्तियां 3,89,271 करोड़ रुपये थी। वर्ष 2009-10 के दौरान कुल राजकोषीय घाटा 4,00,996 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। पहली तीन तिमाही के दौरान राजकोषीय घाटा 3,09,980 करोड़ रुपये रहा।
समीक्षा में कहा गया कि बजटीय अनुमान के अनुसार वर्ष 2009-10 के लिए राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 6.5 फीसदी रहने का अनुमान है, जबकि इसकी तुलना में 2008-09 में यह 5.9 प्रतिशत था।
सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क जैसे अप्रत्यक्ष करों में ज्यादा गिरावट के कारण राजस्व प्राप्तियों में कमी होने की आशंका है।
अप्रैल -दिसंबर 2009 की अवधि में विदेशी मुद्रा भंडार में 31.5 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत हुआ है।
अमेरिकी डॉलर विनिमय दर एक जनवरी 2010 को 46.64 प्रति डॉलर रिकार्ड की गई जो मार्च 2009 के अंत में 50.95 प्रति डॉलर रिकार्ड की गई थी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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