आर्थिक समीक्षा: गरीबी के मोर्चे पर लंबा रास्ता तय करना बाकी
समीक्षा के अनुसार, " दुर्भाग्य से गरीबी के मोर्चे पर भारत को अभी काफी रास्ता तय करना है। योजना आयोग द्वारा गठित विशेषज्ञ समूह की हाल की रिपोर्ट (तेंदुलकर रिपोर्ट के नाम से भी प्रसिद्ध) में भारत की कुल गरीबी 37.2 प्रतिशत होने का अनुमान लगाया गया है। इसका मतलब यह है कि हमारी जनसंख्या का 37 प्रतिशत से थोड़ा अधिक हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे निर्वाह कर रहा है, तथा खासकर ग्रामीण जनसंख्या का 41.8 प्रतिशत और शहरी जनसंख्या का 25.7 प्रतिशत हिस्सा गरीब है।"
समीक्षा में कहा गया है, "यदि हम भारत की गरीबी दर 37.2 प्रतिशत अथवा 27.5 प्रतिशत (जैसा कि 2004-05 के एनएसएस के 61वें दौर के आंकड़ों से पता चलता है) मान लें तो यह कहना आसान होगा कि यह दर भारत जैसे तेजी से विकसित होते राष्ट्र के लिए बहुत अधिक है और इसका मुकाबला करने के लिए विशेष उपाय किए जाने की जरूरत है।"
समीक्षा का मानना है गरीबी उन्मुलन के संदर्भ में मुख्य चुनौती है - गरीबी मिटाने के लिए पहले से ही आवंटित धन को दिशा देना। "ऐसा कर पाने में हमारी असमर्थता निहित स्वार्थो की अपेक्षा अवधारणाओं के कारण अधिक है। "
समीक्षा में गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर इशारा करते हुए कहा गया है, "एक बार किसी नीति को लागू किया जाता है तथा कुछ समय के लिए जारी रखा जाता है तो निहित स्वार्थ इसके समर्थन में एकत्रित हो जाते हैं और ये स्वार्थ परिवर्तन का विरोध करते हैं।"
दिलचस्प बात यह है कि समीक्षा में सरकार ने गरीबी उन्मूलन के लिए बाजार आधारित कीमतों की वकालत की है, " ऐसी वस्तुओं के लिए जो गरीबों के लिए महत्वपूर्ण है, यही सही होगा कि गरीबों को सुरक्षा देने के लिए सरकार हस्तक्षेप करे। ऐसा करने का मानक तरीका है कि किसी किस्म की सब्सिडी का प्रयोग किया जाए। लेकिन एक आम गलती यह मान लेना होती है कि किसी भी सब्सिडी योजना के साथ मूल्य नियंत्रण भी जुड़ा हो।
यह खास फिसलन भरा रास्ता है। एक बड़ी और पेचीदा अर्थव्यवस्था में सरकार के लिए यह भांपना मुश्किल होता है कि किसी वस्तु की सही कीमत क्या है। इसके अलावा, यदि सरकार एक बार किसी वस्तु के दाम तय करने में लग गई तो यह राजनीति और लॉबिंग का मामला बन जाता जो कुल मिलाकर विकृति पैदा करता है। इसलिए बेहतर यही है कि कीमतें बाजार पर छोड़ दी जाएं।
यदि हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि गरीब उपभोक्तोओं को बाजार की अनिश्चतता पर न छोड़ा जाए तो हस्तक्षेप का सबसे बढ़िया तरीका कीमतों को नियंत्रण में लाने के बजाय सीधे गरीबों की मदद की जाए।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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