आरक्षण पर अदालती फैसले को चुनौती देगी आंध्र सरकार (लीड-2)

मुख्य न्यायाधीश ए.आर. दवे की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ ने व्यवस्था दी कि धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता।

सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ में यह फैसला बहुमत के आधार पर लिया गया। दवे सहित पांच न्यायाधीशों ने आरक्षण का विरोध किया। दो न्यायाधीशों की राय अलग थी।

न्यायालय का यह फैसला कांग्रेस सरकार के लिए बड़ा आघात है। कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2007 में मुसलमानों के कुछ पिछड़े समूहों को आरक्षण देने के लिए कानून बनाया था।

कुछ लोगों ने निजी तौर पर तथा कुछ संगठनों ने इस विधेयक को असंवैधानिक करार देते हुए चुनौती दी थी। वर्ष 2004 से यह तीसरी बार है जब उच्च न्यायालय ने मुसलमानों को आरक्षण से इंकार किया है।

याचिकाकर्ताओं के एक वकील रामकृष्ण रेड्डी ने संवाददाताओं को बताया कि न्यायालय ने उनकी दलील को सही ठहराया कि मुसलमानों में पिछड़े लोगों की पहचान करने के लिए कराया गया सर्वेक्षण वैज्ञानिक नहीं था।

पीठ ने इस बात पर गौर पर किया कि मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर सर्वेक्षण सिर्फ छह जिलों में कराया गया और पिछड़ा वर्ग आयोग सिर्फ सरकार द्वारा नियुक्त कृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर ही निर्भर रहा।

फैसले के तत्काल बाद मुख्यमंत्री के. रोसैया ने राज्य के महाधिवक्ता को सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल करने का निर्देश दिया।

मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया कि रोसैय ने महाधिवक्ता को निर्देश दिया है कि एसएलपी दाखिल करने के लिए तत्काल जरूरी कदम उठाए जाएं।

वर्ष 2004 में मुख्यमंत्री वाई.एस.राजशेखर रेड्डी की सरकार ने मुसलमानों को पांच फीसदी आरक्षण मुहैया कराया था लेकिन उच्च न्यायालय इस आदेश को खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय की सिफारिश पर सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग का पुनर्गठन किया था और उसे मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विस्तृत विश्लेषण करने का निर्देश दिया था।

आयोग की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने 2005 में अध्यादेश जारी किया था और उसके आधार पर विधानसभा ने पांच फीसदी आरक्षण देने संबंधी कानून पारित कर दिया था। न्यायालय ने यह कहकर इसे फिर से खारिज कर दिया था कि यह उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित 50 फीसदी आरक्षण की सीमा को पार कर जाएगा।

उसके बाद सरकार ने आरक्षण पांच फीसदी से घटाकर चार फीसदी कर दिया और इस बारे में वर्ष 2007 में आदेश जारी किया। इसके तहत मुसलमानों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े 15 वर्गो के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में चार फीसदी आरक्षण दिया गया।

सरकार इस बारे में भी अध्यादेश लाई जिसे बाद में कानून के रूप में विधानसभा ने पारित कर दिया।

बाद में इस चार फीसदी आरक्षण को भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि सरकार ने पिछड़े वर्गो की पहचान के लिए वैज्ञानिक आंकड़े एकत्र नहीं किए।

उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश में आरक्षण के तहत स्वीकृति को मंजूरी दे दी। इस पर याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी लेकिन याचिकाओं को निपटाने का जिम्मा उच्च न्यायालय पर छोड़ दिया।

इस बीच कुछ विपक्षी पार्टियों ने इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है और राज्य सरकार से आरक्षण को बचाने के लिए कदम उठाने का अनुरोध किया है।

मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लीमीन (एमआईएम) ने चार फीसदी आरक्षण की रक्षा किए जाने की मांग को लेकर राज्य सरकार के सचिवालय के बाहर प्रदर्शन किया। जब प्रदर्शनकारियों ने जबरन सचिवालय में दाखिल होने की कोशिश की तो पुलिस ने एमआईएम विधायकों और उनके समर्थकों को गिरफ्तार कर लिया।

पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता मोहम्मद अली शब्बीर ने कहा कि सरकार मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है और वह इस समुदाय के हितों की रक्षा के लिए हरसंभव कदम उठाएगी।

मुख्य विपक्षी दल तेलुगू देशम पार्टी के उपाध्यक्ष लाल जन बाशा ने कहा कि सरकार मुसलमानों के लिए आरक्षण लागू कराने के प्रति गंभीर नहीं है।

तेलंगाना राष्ट्र समिति के विधायक हरीश राव ने कहा कि मुसलमानों को आरक्षण दिलाने के लिए संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी ने हालांकि अदालत के फैसले का स्वागत किया है। पार्टी की प्रदेश इकाई के अध्यक्ष बंडारू दत्तात्रेय ने कहा, "हमारा यह पक्ष सही साबित हुआ है कि आरक्षण धर्म के आधार पर नहीं दिया जाना चाहिए"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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