नेपाल में राजनीतिक दलों ने भारत के खिलाफ मोर्चा खोला
काठमांडू, 5 फरवरी (आईएएनएस)। देश के कई हिस्सों में नक्सली हिंसा झेल रहे भारत के लिए अब पड़ोसी देश नेपाल से दोहरा माओवादी खतरा बढ़ गया है, क्योंकि वहां के कुछ राजनीतिक दलों ने भारत के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है।
इन संगठनों का दबाव है कि दोनों देशों के बीच 1950 की द्विपक्षीय शांति और मैत्री संधि को तोड़ दी जाए।
नेपाल के राजशाही परिवार को उखाड़ फेंकने के लिए 10 साल तक संघर्ष करने वाली नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी (सीपीएन-एम) भारत विरोध की अगुवाई कर रही है।
नेपाली राजसत्ता के विरुद्ध संघर्ष के दौरान कई माओवादी नेता अपने पुराने दल को छोड़कर सीपीएन-एम से जुड़ गए थे। हालांकि, पुराना दल अब खुद को एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी (यूसीपीएन-एम) कहता है और यह नेपाली संसद में सबसे बड़ा दल है। इसके कुछ बड़े नेताओं ने पिछले साल दल छोड़ दिया था, वे अब नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी (सीपीएन-एम) से जुड़ गए हैं।
भारत सीमा से लगे हुए दक्षिण नेपाल के तराई इलाके में सीपीएन-एम का मजबूत जनाधार है। अलग हुए दो अन्य दल नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत) और क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी इसके सहयोगी हैं।
तीनों दलों ने अब देशव्यापी हड़ताल और काठमांडू में भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन का एलान किया है।
शुक्रवार से नेपाली संसद द्वारा नया संविधान लिखने की शुरुआत हुई है, जिसे 28 मई को लागू किया जाएगा। इन दलों ने मांग की है कि नया संविधान लागू करने से पहले इस संधि को तोड़ दिया जाए।
ये दल भारत, नेपाल और चीन सीमा पर स्थित विवादित कालापानी इलाके में तैनात भारतीय सैनिकों को वापस बुलाने की भी मांग कर रहे हैं, जहां 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान सेना भेजी गई थी।
तीनों दलों ने भारत पर, पश्चिम नेपाल के नवलपरासी स्थित विवादित इलाके सुस्ता के अतिक्रमण का आरोप लगाते हुए यहां की जमीन को वापस सौंपने की मांग उठाई है।
इन संगठनों ने नेपाली सरकार के साथ-साथ भारत के विरुद्ध भी मोर्चा खोल दिया है। विरोध के पिछले चरण के दौरान 2009 में माओवादी प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि नेपाल की सत्ताधारी सरकार भारत की कठपुतली है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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