पद्म पुरस्कार को लेकर विवाद
भारत प्रशासित कश्मीर के ग़ुलाम मोहम्मद मीर को पद्म पुरस्कार दिए जाने को लेकर ख़ासा विवाद खड़ा हो गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे राज्य का अपमान बता रहे हैं.
मोहम्मद मीर के बारे में बताया जाता है कि उन्होंने पृथकतावादी चरमपंथियों के विरुद्ध भारतीय सुरक्षा बलों की बहुत सहायता की है. लेकिन आम कश्मीरी लोगों के बीच में उनकी छवि केवल इतनी भर ही नहीं है.
कई आम लोगों का मानना है कि उनका कुछ हत्याओं, पैसा वसूली और बलात्कार जैसे मामलों में भी हाथ है.
जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ कहते हैं कि गुलाम मोहम्मद मीर एक क़ातिल हैं और कातिल को पद्म पुरस्कार दिया जा रहा है. इससे भारत सरकार यह संदेश देना चाहती है कि उसे राज्य के लोगों की परवाह नहीं, मोहम्मद मीर सरकार के लिए एक अहम चीज़ हैं और वो उन्हें बचा रही है.
घाटी में सुरक्षा बलों की मदद करने वाले अधिकतर काउंटर इंसर्जेंट ऐसे हैं जो पहले चरमपंथी थे लेकिन बाद में सुरक्षाबलों के सामने समर्पण करके उन्होंने चरमपंथ के ख़िलाफ़ सरकार की मदद करने का काम शुरू कर दिया.
पर पद्म पुरस्कारों की घोषणा के बाद विवादों से घिरे मोहम्मद मीर का कहना तो यह है कि वो कभी भी चरमपंथी थे ही नहीं.
उन्होंने कहा, "मैं कभी आतंकवादी नहीं था. मैं तो एक आम नागरिक था. मेरा कसूर इतना ही है कि मैंने भारत का साथ दिया है. अगर कोई साबित कर दे कि मैं आतंकवादी था तो मैं फाँसी पर चढ़ने को तैयार हूँ."
हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस मामले से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया है कि उन्होंने मीर को पद्म पुरस्कार दिए जाने की सिफ़ारिश नहीं की लेकिन मीर का कहना है कि इसके लिए उमर अब्दुल्ला के पिता फ़ारूक अब्दुल्ला ने केंद्र से सिफ़ारिश की थी.
इस मुद्दे पर राज्य की विपक्षी पार्टी पीडीपी राज्य सरकार को आड़े हाथों ले रही है लेकिन मीर ने इस बाबत बताया है कि पीडीपी से उनके अच्छे ताल्लुक रहे हैं, पीडीपी के टिकट पर उनकी बेटी चुनाव भी लड़ चुकी है. ऐसे में पीडीपी का विरोध बेमानी हो जाता है.












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