महाकुंभ पर धर्म निरपेक्षता की छटाएं

महाकुंभ पर धर्म निरपेक्षता की छटाएं

हरिद्वार कुंभ में जहाँ संतों का रेला और भक्तों का मेला दिखाई दे रहा है वहीं इस तीर्थनगरी में धर्म निरपेक्ष भारत का भी साक्षात दर्शन हो रहा है. महाकुंभ की विविध छटाएं सबको मोहित कर रही हैं और इस बार ख़ास बात है इसकी सांप्रदायिक सद्भावना की रंगतें.

यूं तो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष और शिया आलिम कल्बे सादिक़ ने गंगा में डुबकी लगाने के लिए हरिद्वार जाने का एलान किया है. लेकिन हरिद्वार के स्थानीय मुसलमानों ने एक क़दम आगे बढ़कर सद्भावना की निराली मिसाल पेश कर दी.

हिंदू धर्म के 13 प्रमुख अखाड़ों के पेशवाई जुलूस ने शुभ मुहूर्त में कुंभ नगरी हरिद्वार में प्रवेश किया. ये जुलूस जब ज्वालापुरी इलाके में पंहुचा तो मुस्लिम समुदाय के स्थानीय लोगों ने हर की पैड़ी जाने वाले साधुओं के इन जत्थों का सत्कार किया और उन्हें फूल मालाएं पहनाईं.

मुस्लिम संप्रदाय के सदस्य न केवल साधू सन्यासियों का दिल खोल कर स्वागत कर रहे हैं बल्कि उनके आशीर्वाद से स्वयं को धन्य मान रहे हैं. उन्हें नाश्ता कराया गया, मालाएं पहनाई गईं और दुआएं ली गईं. यही नहीं पेशवाई की सवारियों घोड़ों और हाथियों को भी खाना खिलाया गया.

जूना अखाड़े के रमता पंचों को कनखल की मुस्लिम बिरादरी के लोगों ने जहाँ जलपान कराया वहीं गेंदे के फूलों की मालाओं को उनके गले में डाल उनका आशीर्वाद प्राप्त किया.

मुस्लिम बिरादरी के रशीद अहमद का कहना था कि भारत में हिंदू और मुसलमानों के बीच सदियों से समभाव चला आ रहा है लेकिन सियासतदानों ने इसको केवल अपने स्वार्थों के चलते खो दिया. इसे पुनः बहाल करने की ज़रुरत है.

इस स्वागत से अभिभूत हुए अग्नि अखाड़े के गोविंदानंद महाराज ने तो अपनी माला भी मुस्लिम स्वागतकर्ताओं के गले में डाल उन्हें गले लगाकर कहा कि तोड़ना नहीं सिखाता, धर्म है ही जोड़ने का नाम.

कुंभ के इतिहास में ये अपने किस्म की पहली मिसाल है. इसके संयोजक एहसान अंसारी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि वे ये संदेश देना चाहते हैं कि, “जब ये इतना बड़ा मेला हो रहा है तो हम भी अपने हिंदू भाइयों के इस पवित्र मौक़े पर उनके साथ हैं. हम पूरी दुनिया को ये बताना चाहते हैं कि गंगा-जमुनी तहज़ीब अब भी यहां बनी हुई है और हमें कोई बांट नहीं सकता.”

“हम संतों के भी शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने हमारी मेज़बानी कबूल की.”

साधु-संत भी इस सत्कार से अभिभूत हैं. महाराज कर्णपुरी ने इस अवसर पर कहा, “इससे हमारा और देश का गौरव बढ़ा है.”

एक तरफ़ कुंभ नगरी मे संतों के आगमन का इस तरह से स्वागत चल रहा है तो दूसरी तरफ़ पेशवाईयों में शरीक होकर मुस्लिम अपनी बग्घियों से संतों की सेवा में जुटने लगे है. जूना अखाड़े की पेशवाई के लिए माघ पूर्णिमा के दिन निकलने वाली पेशवाई की सारथी की भूमिका में यही बग्घी वाले रहेंगे.

बग्घी मालिक निसार अहमद का कहना है कि उनकी बग्घी में जैसे ही महामंडलेशवरों के चरण पड़ेंगे तो उनका जीवन धन्य हो जायेगा.

इसके अलावा बैंड बाजों का काम करने वाले, घोड़ों को पाल कर आजीविका कमाने वाले मुस्लिमों में भी ख़ासा उत्साह है. उनका कहना है कि पेशवाई के दौरान उनको संतों का साथ तो मिलेगा ही उनकी रोज़ी रोटी भी चलेगी.

कुंभ का बेसबरी से इंतज़ार कर रहे तौहीद हसन सिद्धिक़ी का कहना है कि वे मुस्कान नाम से 10 बग्घियों के मालिक हैं. पूरे कुंभ के दौरान निकलने वाली पेशवाईयों मे उनकी बग्घियों कि बुकिंग हो गई है . ऐसा नहीं है कि पहली बार ही वे हिंदू संतों के आयोजन में भागीदार बन रहे है यहाँ तमाम शोभा यात्राओं में वे भागीदार बन चुके हैं.

लेकिन 12 वर्ष बाद होने वाला यह ख़ास मेला उनके जीवन मे भी ख़ास साबित होने वाला है.

हीना बग्घी के मालिक यासीन राजा बग्घी के सरफराज़ और राजू बग्घी के रुस्तम को भी अखाड़ों कि पेशवाई के लिए बुक किया गया है . पेशवाह जिसे देवयात्रा के सामान ही माना जाता है में सबसे पहले गुरु महाराज यानी आचार्य महामडलेशवर बग्घी मे सवार होकर तो इसके बाद डोली फिर निशान फिर डंका के बाद महामडलेशवर और नागाओं का पूरा झुण्ड चलता है यह पूरे नगर के भ्रमण पर चलते है जिनका नगरभर के लोग पुष्प वर्षा से स्वागत कर दर्शन लाभ कमाते है.

उधर मौलाना कल्बे सादिक के बयान के मुताबिक हिंदू-मुसलमान के बीच प्रेम भावना को बढ़ाने के लिये वो भी कुंभ मेले में गंगा में स्नान करेंगे. हालांकि जैसा कि अक्सर होता है कुछ कट्टरपंथी लोगों ने इसका विरोध किया है और देवबंद को ख़त लिखकर ऐसे लोगों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किए जाने की मांग की है. इन कट्टरपंथियों की दलील है कि ये काम इस्लाम के नियमों के विरुद्ध है.

(महेश चंद्रा और शालिनी जोशी, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए, हरिद्वार से)

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