आपातकाल की घोषणा (गणतंत्र दिवस पर विशेष-3)

नई दिल्ली, 19 जनवरी (आईएएनएस)। आईएएनएस की चुनिंदा भाषणों की श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज पेश है इंदिरा गांधी का भाषण। जैसा की इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा है, 12 जून, 1975 का दिन इंदिरा गांधी के लिए एक बुरा दिन था। तड़के सुबह उन्हें बताया गया कि उनके पुराने सहयोगी डी.पी. धर का स्वर्गवास हो गया। देर सुबह यह खबर आई कि गुजरात के चुनावों में कांग्रेस की पराजय हो रही है और फिर आया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय, जिसमें चुनाव में सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के कारण सन् 1971 के आम चुनाव में रायबरेली से उनका निर्वाचन रद्द कर दिया गया था।

कई वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं का मत था कि इस निर्णय के बाद उन्हें प्रधानमंत्री पद त्याग देना चाहिए। परंतु उन्होंने अपने छोटे बेटे संजय गांधी और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय की सलाह मानना ठीक समझा। 25 जून, 1975 को राय ने देश में आतंरिक आपातकालीन स्थिति की घोषणा के अध्यादेश का प्रारूप बनाने में उनकी सहायता की। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने बिना किसी विरोध के उस पर हस्ताक्षर कर दिए।

अध्यादेश से लैस होकर इंदिरा गांधी ने दिल्ली के सभी समाचार-पत्रों की बिजली आपूर्ति रुकवा दी, ताकि दूसरे दिन कोई अखबार न निकले। 26 जून की सुबह छह बजे केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई गई। सदस्यों को आपातकाल के बारे में बताया गया और उनकी औपचारिक सहमति प्राप्त कर ली गई। राष्ट्र में आपातकालीन स्थिति की घोषणा करने के लिए इंदिरा गांधी ने ऑल इंडिया रेडियो के स्टूडियो की ओर प्रस्थान किया। पेश है इंदिरा गांधी का भाषण-

राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा कर दी है। इसमें घबराने की कोई बात नहीं है। मुझे विश्वास है कि आप सब लोग उस गहरे और व्यापक षड्यंत्र के प्रति सचेत हैं, जो तभी से रचा जा रहा था, जब से मैंने भारत के आम आदमी - स्त्री व पुरुष को लाभ पहुंचानेवाले प्रगतिशील कदम उठाए थे। प्रजातंत्र के नाम पर प्रजातंत्र की भूमिका को ही नकारा जा रहा है। विधिवत निर्वाचित सरकारों को काम नहीं करने दिया जा रहा है और कुछ मामलों में तो विधिवत निर्वाचित विधानसभाओं को भंग कराने के उद्देश्य से सदस्यों को बलपूर्वक त्यागपत्र देने के लिए मजबूर किया जा रहा है। विरोध प्रदर्शनों ने वातावरण में उत्तेजना घोल दी है, जिसके परिणामस्वरूप हिंसक घटनाएं हुई हैं। मेरे मंत्रिमंडलीय सहयोगी एल.एन. मिश्र की नृशंस हत्या से सारा देश स्तब्ध रह गया। भारत के मुख्य न्यायाधीश पर हुए कायराना हमले पर भी हम गहरा दु:ख प्रकट करते हैं।

कुछ लोग तो हमारे सैन्य बलों और पुलिस को विद्रोह करने के लिए उकसाने की हद तक जा पहुंचे हैं। यह तथ्य कि हमारे सुरक्षा बल एवं पुलिस अनुशासित और पक्के देशभक्त हैं, इसलिए उनकी बातों में नहीं आते, उनकी इस उत्तेजक कार्रवाई की गंभीरता को कम नहीं करता।

हमारी एकता को खतरे में डालने के लिए विखंडनकारी तत्व अपनी पूरी शक्ति से काम कर रहे हैं और सांप्रदायिक उन्माद भड़का रहे हैं।

मुझ पर हर तरह के झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं। भारत के लोग मुझे बचपन से जानते हैं। मेरा सारा जीवन जनता की सेवा में बीता है। यह कोई व्यक्तिगत मामला नहीं है। मैं प्रधानमंत्री बनी रहती हूं या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है। परंतु प्रधानमंत्री की संस्था महत्वपूर्ण है और जान-बूझकर उसकी गरिमा को कम करने का राजनीतिक प्रयास प्रजातंत्र या राष्ट्र के हित में नहीं है।

एक लंबे समय से हमने बड़े धर्य से इन घटनाओं का अवलोकन किया है। अब हमें सामान्य कामकाज ठप कर देने के उद्देश्य से सारे देश में कानून और व्यवस्था को चुनौती देनेवाले एक नए कार्यक्रम का पता चला है। कोई भी प्रभावी सरकार देश की स्थिरता को खतरे में डालनेवाली कार्रवाईयों को चुपचाप खड़े नहीं देख सकती। कुछ लोगों के विध्वंसक कार्य बहुसंख्यक लोगों के अधिकारों का हनन कर रहे हैं। ऐसी कोई भी स्थिति, जो राष्ट्रीय सरकार की देश के भीतर निर्णायक कार्रवाई करने की क्षमता को कमजोर करती है, निश्चित रूप से बाहरी खतरों को बढ़ाने का काम करती है। अपनी एकता और स्थिरता की रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है। राष्ट्र की अखंडता ठोस कार्रवाई की मांग करती है।

आंतरिक स्थिरता को खतरा उत्पादन और आर्थिक विकास की संभावनाओं को भी प्रभावित करता है। हमारी दृढ़ निश्चयी कार्रवाईयों के कारण पिछले कुछ महीनों में हमें मूल्य-वृद्धि को नियंत्रित रखने में काफी सफलता मिली है। अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा विभिन्न वर्गो - विशेष रूप से गरीब, असुरक्षित एवं निम्न आय वाले लोगों की कठिनाइयां कम करनेवाले उपायों पर हम सक्रियता से विचार कर रहे हैं। मैं उनकी घोषणा शीघ्र ही करूंगी।

मैं आपको यह आश्वासन देना चाहूंगी कि आपातकाल की यह नई घोषणा कानून का पालन करनेवाले नागरिकों को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करेगी। मुझे विश्वास है कि आंतरिक स्थितियां तेजी से सुधरेंगी तथा जितनी जल्दी हो सके, हम इस घोषणा को वापस ले सकें। भारत के सभी भागों से और सभी वर्गो के लोगों से मिले शुभकामना संदेशों से मैं अभिभूत हूं। क्या आनेवाले दिनों में आपके सतत सहयोग और विश्वास के लिए मैं आपसे अनुरोध कर सकती हूं?

(प्रभात प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित और रुद्रांक्षु मुखर्जी द्वारा संपादित पुस्तक 'भारत के महान भाषण' से साभार।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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