बुझ गई वामपंथ की 'ज्योति' (राउंडअप)
कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल के चिकित्सकों के मुताबिक बसु ने सुबह 11.47 बजे आखिरी सांस ली। माकपा के वरिष्ठ नेता विमान बोस ने उनके निधन की औपचारिक घोषणा की। उन्होंने संवाददाताओं से बातचीत में कहा, "ज्योति बसु नहीं रहे।"
बोस ने कहा कि बसु का दाह संस्कार नहीं किया जाएगा बल्कि उनके शरीर को मंगलावार को एफएसकेएम अस्पताल को सुपुर्द कर दिया जाएगा क्योंकि उन्होंने अपना शरीर दान करने की इच्छा व्यक्त की थी।
इससे पहले उनके पार्थिव शरीर को राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग और पश्चिम बंगाल विधानसभा में रखा जाएगा। विधानसभा में उनके शव को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी केंद्र सरकार के कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर उनकी आखिरी विदाई में शिरकत करेंगे।
ज्योति बसु के निधन पर जहां देश भर में शोक की लहर फैल गई वहीं राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सहित सभी दलों के वरिष्ठ नेताओं ने भी गहरा शोक प्रकट किया है। दिवंगत नेता के सम्मान में पार्टी के सभी कार्यालयों के ध्वज झुका दिए गए।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने इस वयोवृद्ध मार्क्सवादी नेता के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उनके निधन से देश ने एक वरिष्ठ और महत्वपूर्ण जन नेता खो दिया।
पाटील ने अपने शोक संदेश में कहा, "बसु ने जन नेता, एक कुशल प्रशासक और महत्वपूर्ण राजनेता के रूप में अपनी काबिलियत दर्शाई। उन्हें एक वरिष्ठ राजनेता के तौर पर देखा जाता था। देश के कई नेता उनसे सलाह लिया करते थे।"
उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि वह अपने पीछे एक ऐसा शून्य छोड़ गए हैं जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इस वयोवृद्ध नेता के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने बसु को ऐसा निष्ठावान व सबकी सहमति से चलने वाला नेता बताया, जिनसे वह अक्सर सलाह लिया करते थे।
बसु के बेटे चंदन बसु को भेजे शोक संदेश में प्रधानमंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल के इस पूर्व मुख्यमंत्री के निधन से भारतीय राजनीति के एक युग का अंत हो गया। "वह राष्ट्रीय स्तर पर बहुत ही शक्तिशाली क्षेत्रीय आवाज थे। उन्होंने हमारे संघीय ढांचे को मजबूती प्रदान की।"
प्रधानमंत्री ने कहा, "ऐसे महान देशभक्त और इतने बड़े विद्वान के निधन से मुझे निजी क्षति हुई है। उनके निधन पर मैं गहरी संवेदना प्रकट करता हूं।"
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बसु के निधन पर गहरा शोक जताया है। उन्होंने कहा है कि वह ऐसे योद्धा थे जिन्होंने न सिर्फ जीवन पर्यन्त लड़ाई लड़ी बल्कि अंतिम सांस तक जीवन के साथ संघर्ष किया।
सोनिया ने बसु के पुत्र चंदन बसु को भेजे अपने शोक संदेश में कहा, "ज्योति बसु ने देश, अपनी पार्टी और अपने राज्य के प्रति आधे से अधिक शताब्दी तक पूरे समर्पण के साथ सेवा की। वह सम्प्रदायवाद, कट्टरवाद, जातिवाद तथा प्रगतिवाद विरोधियों के खिलाफ न थकने वाले योद्धा थे। वह सामाजिक न्याय, समानता और गरीबी मिटाने के पक्ष में लड़ने वाले योद्धा व सच्चे देशभक्त थे, जिसके लिए राष्ट्र हित सर्वोपरि था।"
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने बसु को श्रद्धांजलि देते हुए कहा है कि उनके निधन से देश के वामपंथी और लोकतांत्रिक आंदोलन को बहुत बड़ा झटका लगा है।
देश के वामपंथी और लोकतांत्रिक आंदोलन में बसु की भूमिका को याद करते हुए भट्टाचार्य ने कहा, "उनके निधन से देश ने एक महान नेता खो दिया है। इससे देश के वामपंथी और लोकतांत्रिक आंदोलन को एक बहुत बड़ा झटका लगा है।"
उन्होंने कहा, "ज्योति बाबू के निधन से हमें गहरा आघात लगा है। देश व देश से बाहर समाज के हर वर्ग के वह चहेते थे। अपने योगदानों के लिए वह हमेशा याद किए जाएंगे।"
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने शोक संदेश में कहा कि बसु के निधन से भारतीय राजनीति का एक अध्याय समाप्त हो गया।
माकपा महासचिव प्रकाश करात ने बसु के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा, "ज्योति बसु जैसा फिर कोई नहीं होगा।"
गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने एएमआरआई अस्पताल के बाहर संवाददाताओं से कहा, "वह एक महान विभूति थे जो दशकों तक भारतीय राजनीति के पटल पर विद्यमान रहे। वह पश्चिम बंगाल के ही नहीं, बल्कि भारत के नेता थे। वह महान देशभक्त, महान लोकतांत्रिक नेता और प्रेरणा के महान स्रोत थे। उन्होंने भारतीय जनता की बेहतरीन सेवा की।"
बसु को देश के बहुमूल्य सपूतों में से एक करार देते हुए कांग्रेस ने कहा कि उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में सादगी से जनता की सेवा की। कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद ने कहा कि बसु का निधन सिर्फ पश्चिम बंगाल और माकपा के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए क्षति है।
मार्क्सवाद व वामपंथ का निरंतर विरोध करने वाले प्रमुख राष्ट्रवादी सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) तथा दक्षिणपंथी राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने वयोवृद्ध बसु के निधन पर शोक जताया।
आरएसएस के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने एक बयान जारी कर कहा, "ज्योति बसु के निधन से देश की जनता को गहरा धक्का पहुंचा है। उनका जीवन मार्क्सवाद के प्रति समर्पित रहा। अपने राजनीतिक संघर्ष के दौरान वह सत्ता में रहे हों या सत्ता से बाहर, उन्होंने अपनी विचारधारा से कभी कोई समझौता नहीं किया।"
उन्होंने कहा, "बसु के निधन से देश ने एक समर्पित और सैद्धांतिक नेता खो दिया। उनके निधन पर संघ परिवार की ओर से मैं उनके निजी व वैचारिक परिवार के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करता हूं।"
भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के वरिष्ठ नेता ज्योति बसु को वामपंथ का वास्तविक पुरोधा बताया। उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए गडकरी ने कहा कि यह बसु का कद व उनकी विश्वसनीयता ही थी जिसके चलते उन्होंने राजनीतिक जीवन में इतनी लंबी पारी खेली।
गडकरी ने रविवार को एक बयान जारी कर कहा, "ज्योति बसु समकालीन भारत के शीर्ष नेताओं में थे। वह ऐसे नेता थे जो समाज के निचले तबके, विचारधारा और अपने आदर्शो के प्रति समर्पित थे।"
राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा कि ज्योति बाबू भारतीय राजनीति में सबसे लंबे समय तक विद्यमान रहने वाले सबसे विश्वसनीय नेता थे।
माकपा पोलित ब्यूरो की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "ज्योति बसु ऐसे मार्क्सवादी थे जिनका विश्वास कभी भी डगमगाया नहीं। वह ऐसे मार्क्सवादी थे, जो हठी नहीं थे और पार्टी की दिशा तय करने के लिए हमेशा अपने व्यापक अनुभवों से सीख लेते रहे।"
अपने दिवंगत प्रिय कामरेड को याद करते हुए माकपा ने कहा, "हम उनके मकसद और कार्यों को आगे ले जाने का प्रयास करेंगे।"
पोलित ब्यूरो के बयान में कहा गया है, "देश का वाम आंदोलन खुशकिस्मत है कि उसे ऐसे संपूर्ण और समर्पित नेता की नुमाइंदगी, पश्चिम बंगाल में ऐसा संचालन तथा लंबे अर्से तक पार्टी का ऐसा नेतृत्व मिला। हम सभी के पास उनकी बहुमूल्य विरासत है जिसे हम संजोकर रखें तथा आगे बढ़ाएं।"
केरल के मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन ने ज्योति बसु के निधन को बहुत बड़ी क्षति बताते हुए उन्हें आधुनिक बंगाल का निर्माता करार दिया।
बहरहाल, ज्योति बसु को विश्व के सबसे सफल वामपंथी नेताओं में से एक कहा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
लेनिन और स्टालिन सरीखे वामपंथ के पुरोधाओं में शुमार किए जाने वाले 'ज्योति बाबू' जब युनाइटेड किंगडम से वामपंथ का 'ककहरा' सीखकर भारत लौटे तो किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह आदमी देश की आर्थिक व राजनीतिक शक्ति का केंद्र कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल में 23 वर्षो तक शासन करेगा और सबसे लंबे समय तक देश के किसी राज्य का मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड बनाएगा।
यही नहीं, उनके राजनीतिक सफर में एक मौका तो ऐसा भी आया कि वह देश के प्रधानमंत्री सिर्फ इसलिए नहीं बन सके, क्योंकि उनकी पार्टी ने इसकी इजाजत नहीं दी। बाद में ज्योति बाबू ने खुद इसे अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी 'गलती' करार दिया था।
कोलकाता के एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे ज्योति बाबू ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स कॉलेजिएट स्कूल से ग्रहण की। उनके पिता निशिकांत बसु तत्कालीन पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) के ढाका जिले के बरोडी गांव के रहने वाले थे और वे पेशे से डाक्टर थे। प्रेसिडेंसी कॉलेज से उन्होंने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की और आगे की पढ़ाई के लिए वे युनाइटेड किंगडम चले गए।
भूपेश गुप्ता नामक अपने एक मित्र की मार्फत वह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन से जुड़ गए। यहीं उन्होंने वामपंथ का ककहरा सीखा।
इसके बाद वह वर्ष 1940 में भारत लौटे और अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक सदस्य बन गए। ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता के तौर पर अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत करने वाले ज्योति बाबू पहली दफा 1946 में बंगाल विधानसभा के लिए चुने गए। इसके बाद वह लगातार चुनाव जीतते रहे। वर्ष 1967 में वह बंगाल के उपमुख्यमंत्री बने और 1969 में पुन: इसी पद पर आसीन हुए।
21 जून 1977 को ज्योति बाबू पहली बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने। वह छह नवम्बर 2000 तक इस पद पर रहे। इस प्रकार लगातार 23 वर्षो तक वह पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद पर रहे। भारतीय राजनीति के इतिहास में इतने लंबे समय तक किसी राज्य का मुख्यमंत्री बने रहने का ऐसा कीर्तिमान उन्होंने स्थापित किया जिसे छू पाना आज के राजनेताओं के लिए दिवास्वप्न जैसा है।
वर्ष 1996 में एक ऐसा पल आया जिसे खुद ज्योति बाबू अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल बता चुके हैं। संयुक्त मोर्चा में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में उनके नाम पर सर्वसम्मति बनी लेकिन पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था 'पोलित ब्यूरो' ने फैसला किया कि पार्टी सरकार में शामिल न होकर बाहर से समर्थन देगी। इस निर्णय के चलते एच. डी. देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने।
ज्योति बाबू ने स्वास्थ्य कारणों से 2000 में बंगाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और उनकी जगह बुद्धदेव भट्टाचार्य को सूबे की कमान संभालने का मौका मिला। इसके बाद धीरे-धीरे ज्योति बसु की राजनीतिक सक्रियता कम होती चली गई। वर्ष 2006 में ज्योति बाबू ने राजनीति से संन्यास लेने की इच्छा जाहिर की, लेकिन पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने उनसे आग्रह किया कि 2008 में होने वाली पार्टी की 19वीं कांग्रेस तक वह संन्यास न लें।
वर्ष 2008 में हुई पार्टी की 19वीं कांग्रेस में उन्हें पार्टी के पोलित ब्यूरो में शामिल नहीं किया हालांकि वह पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य बने रहे और उन्हें पोलित ब्यूरो का विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया।
वर्ष 2006 के जनवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने कोलकाता के साल्ट लेक में जमीन आवंटन के सिलसिले में ज्योति बाबू को नोटिस जारी किया। इसे छोड़ दिया जाए तो ज्योति बाबू का राजनीतिक जीवन विवादों से परे ही रहा।
ज्योति बाबू बेशक इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन भारतीय राजनीति में जब भी वामपंथ का जिक्र आएगा निश्चित तौर पर सबसे पहले उनका नाम लिया जाएगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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