गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली के 'राजपथ' पर चलेगा जयपुर का 'जंतर-मंतर'
राजस्थान ललित कला अकादमी के प्रदर्शनी अधिकारी और झांकी के नोडल अधिकारी विनय शर्मा ने बताया कि झांकी की परिकल्पना जयपुर के पारस भंसाली और थ्री-डी मॉडल जयपुर के ही हरशिव शर्मा ने तैयार किया है।
जयपुर की ऐतिहासिक जंतर-मंतर वेधशाला की इस झांकी के अग्रभाग में जयपुर शहर के विशेष स्थापत्य द्वार का नमूना और जंतर-मंतर के 'नाड़ी यंत्र' के साथ जयपुर नगर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह की प्रतिमा को दर्शाया जाएगा।
झांकी के पाश्र्वभाग (ट्रेलर) में जंतर-मंतर का रामयंत्र, वृहद एवं लघु सम्राट यंत्र, जय प्रकाश यंत्र आदि के साथ ही जयपुर की अनूठी एवं बेजोड़ स्थापत्य कला से संबंधित विभिन्न डिजाइनों की जालियां, कंगूरे एवं झरोखों को प्रदर्शित किया जाएगा। साथ ही ज्योतिषियों एवं पर्यटकों के थ्री-डी मॉडल भी विभिन्न मुद्राओं में दर्शाए जाएंगे।
संपूर्ण झांकी के आगे जंतर-मंतर के 'नाड़ी यंत्र' के साथ चार कलशधारी महिलाएं और पांच ज्योतिषियों का दल जंतर-मंतर से संबंधित श्लोकों का मंत्रोच्चारण करते हुए पैदल चलेगा।
जंतर-मंतर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
जयपुर शहर के निर्माता महाराजा सवाई जयसिंह की ज्योतिष के प्रति गहन रूचि थी। वे ज्योतिष शास्त्र में उपलब्ध 'ग्रह-गणित' की 'आकाशीय स्थिति' का प्रत्यक्षीकरण करके देखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथ 'सूर्य सिद्घान्त' का विधिवत अध्ययन किया तथा इन ग्रंथों के आधार पर सारणियां (टेबल्स) बनाकर आकाशीय ग्रह स्थिति का प्रत्यक्षीकरण करना चाहा, परन्तु इसकी पूर्ति बिना यंत्रों के संभव नहीं थी।
अत: उनके मन में सन् ई. में 'वेधशााला' के निर्माण का विचार उत्पन्न हुआ। इस प्रकार छह वर्षो के निरन्तर परिश्रम के उपरान्त तथा धातु यंत्रों के वेधकार्यो से संतुष्ट होने पर उन्होंने देश की राजधानी दिल्ली स्थित तत्कालीन जयसिंहपुरा नामक स्थान पर सन् 1724 ई. में 'प्रथम पाषाण वेधशाला' का निर्माण कराया। तत्पश्चात उज्जैन, बनारस, मथुरा आदि स्थानों पर भी विभिन्न अक्षांशों-रेखांशों पर आधारित 'वेधशालाओं' का निर्माण कराया।
जयपुर स्थित वेधशाला का निर्माण महाराजा सवाई जयसिंह ने सन् 1728 ई. में प्रारम्भ किया जो लगभग 1734 ई. में पूर्ण हुआ। जयपुर वेधशाला में उक्त पांचों वेधशालाओं से यंत्रो की सख्ंया अधिक होने व 'राशि वलय' नामक यंत्र अन्य वेधशालाओं मे उपलब्ध नहीं होने के कारण जयपुर वेधशाला महत्वपूर्ण है। इस वेधशाला में कुल 16 यंत्र उपलब्ध हैं। वर्तमान में उक्त सभी वेधशालाएं भारत एवं विश्व के मानचित्र पटल पर 'जन्तर मन्तर' के नाम से प्रसिद्घ हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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