अगर प्रभाकरन ने पिता का कहा माना होता..

नई दिल्ली, 10 जनवरी (आईएएनएस)। श्रीलंकाई तमिल विद्रोही संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे)प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन ने अगर अपने पिता की बात मानी होती तो वह न तो लिट्टे की स्थापना करता और न ही अपने परिवार और अपने ख्वाबों के साथ यूं मारा जाता।

प्रभाकरन के पिता तिरूवेंद्रम वेलुपिल्लई ने जी-जान से कोशिश की कि उनका छोटा पुत्र तमिल राष्ट्रवाद की रौ में न बहकर मन लगाकर पढ़ाई करे। वेलुपिल्लई का पिछले सप्ताह सेना की हिरासत में निधन हो गया।

वेलुपिल्लई के चार बच्चे थे और उनकी परेशानी के कारण अनेक थे। 1960 में जब प्रभाकरन किशोर था, तमिल-सिंहली रिश्ते बिगड़ रहे थे। उसका घर वेल्वेट्टिरई में था, जहां तस्करी जीवन यापन का जरिया थी।

वेल्लुपिल्लई सरकारी कर्मचारी थे जो एक क्लर्क से तरक्की पाकर डिस्ट्रिक्ट लेन ऑफीसर के ओहदे तक पहुंचे थे। जिनका कार्य वनक्षेत्रों में बस्तियां बसाने से संबद्ध था। वेलुपिल्लई को अपनी नौकरी बहुत प्यारी थी और वह नहीं चाहते थे कि उनके छोटे पुत्र की खातिर उनकी नौकरी को कोई नुकसान हो।

यह देखते हुए कि प्रभाकरन स्कूली पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पा रहा है, उन्होंने घर पर उसके लिए ट्यूशन लगवा दी। वह भी सख्ती बरतने लगे। उनकी पत्नी और वह शायद ही प्रभाकरन को कभी अपनी नजरों से ओझल होने देते थे। प्रभाकरन के पिता घर में आने वाले अपने पुत्र के दोस्तों के साथ भी अच्छा व्यवहार नहीं करते थे।

बरसों बाद, जब प्रभाकरन श्रीलंका और अन्य स्थानों में एक चर्चित नाम बन गया तो एक बार उसने कहा, "मेरे पिता ने अपने निजी आचरण के लिए एक मिसाल कायम की। उन्होंने कभी पान तक नहीं चबाया। मैंने उनके आचरण के अनुरूप खुद को ढाला।...वह सख्त थे, लेकिन वह बहुत नरम और समझाने-बुझाने वाले भी थे।"

लेकिन उन दिनों के दौरान जाफना में, किसी भी तरह का समझाना-बुझाना प्रभाकरन को तमिल आतंकवाद की ओर कदम बढ़ाने से रोक नहीं सका। सन 1970 के दशक के आरंभ में वह दिन आन पहुंचा, जब किशोर प्रभाकरन अपने घर से भाग गया और फिर कभी लौटकर नहीं आया। वेल्लुपिल्लई कुछ न कर सके।

प्रभाकरन के हिंसा और खून-खराबे की दुनिया में कदम रखने और लिट्टे के बदनाम होते जाने को खामोशी से देखने के सिवाए उसके पिता वेल्लूपिल्लई के पास और कोई चारा न था।

श्रीलंका में गृहयुद्ध छिड़ने पर, सेवानिवृत्त हो चुके वेल्लुपिल्लई अपनी पत्नी के साथ तमिलनाडु चले आए, जहां प्रभाकरन रह रहा था और लिट्टे के सुरक्षित ठिकाने थे। वेल्लुपिल्लई मदुरई में शांति से जीवन बिताने लगे। वह इतनी सादगी से रहते थे कि ज्यादातर पड़ोसी उन्हें जानते तक नहीं थे।

एक बार चेन्नई में इस पत्रकार से मुलाकात के दौरान वेल्लुपिल्लई ने प्रभाकरन के बचपन के दिनों के बारे में जानकारी दी थी और संकेत दिया था कि उनके पुत्र ने जो हासिल किया है, उससे उन्हें गर्व है।

लेकिन 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद प्रभाकरन भारत में अवांछित व्यक्ति बन गया। इसके बाद वेल्लुपिल्लई भी श्रीलंका चले गए।

इसके बाद उनका पुत्र श्रीलंका के पूर्वोत्तर का अघोषित हुक्मरान बन बैठा। उसे भारत और अन्य देश आतंकवादी करार दे चुके थे और यह स्पष्ट हो चला था कि प्रभाकरन को फौजी तरीके से हराना असंभव होगा।

लेकिन अविश्वसनीय घटनाक्रम मई 2009 में घटित हुआ, श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के आखिरी गढ़ को भी ध्वस्त कर डाला। सेना ने प्रभाकरन, उसकी पत्नी, दोनों पुत्रों के साथ-साथ पूरे संगठन का सफाया कर दिया।

बुरी तरह टूट चुके वेल्लूपिल्लई और उसकी पत्नी ने सेना के समक्ष समर्पण कर दिया। यह स्पष्ट था कि उनकी नियती अब उस प्रशासन के हाथ है, जिसे उनका बेटा उखाड़ फेंकना चाहता था।

सेना की हिरासत में ही प्रभाकरन के 87 वर्षीय पिता ने सात जनवरी 2010 को दम तोड़ दिया। वह मधुमेह और हृदय रोग से ग्रसित थे।

श्रीलंका की तमिल राजनीति की विडंबना है कि वेल्लुपिल्लई का शव तमिल राजनीतिज्ञ एम. के. शिवाजीलिंगम को सौंपा गया, जिन्हें प्रभाकरन 1986 में कत्ल कर देना चाहता था।

यह महज भाग्य का खेल है कि शिवाजीलिंगम आज भी जीवित हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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