देश में प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की कमी : नायर

Madhvan
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व अध्यक्ष और चंद्रयान मिशन में एक अहम् कड़ी रहे डॉ जी माधवन नायर ने बीबीसी से हुई एक ख़ास बातचीत में कहा है कि भारत में प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की कमी है.

तिरुअनन्तपुरम में चल रही भारतीय विज्ञान कांग्रेस अधिवेशन के दौरान नितिन श्रीवास्तव के साथ हुई इस बातचीत के अंश:

कल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि भारतीय विज्ञान जगत में लालफीताशाही और राजनीतिक दखलंदाजी मौजूद है. क्या आप इस बात से सहमत हैं और अगर हाँ तो क्यों?

मुझे प्रधानमंत्री के बयान से इत्तेफ़ाक़ रखना पड़ेगा क्योंकि विज्ञान सम्बंधित योजनाओं में नौकरशाही के चलते तमाम किस्म की दिक्कतें आती रही हैं पर संयोग से भारत का अंतरिक्ष और आण्विक विभाग शुरू से ही प्रधानमंत्री कार्यालय के अंतर्गत रहा है जिससे हमें ख़ास दिक्कतें नहीं आईं. शायद इसी वजह से राजनीतिक दखलंदाज़ी भी मुमकिन नहीं थी. ऐसे कई विभाग हैं जिन्हें अनुसंधान के लिए कोष की हरी झंडी मिल जाती है लेकिन लालफीताशाही के चलते वे अपनी समय सीमा से पीछे छूट जाते हैं. पर इन सबसे बड़ी जो दिक्कत है वे ये है की भारत में प्रशिक्षित वैज्ञानिकों की कमी. एक समय ऐसा भी था जब तमाम लोग विज्ञान की पढाई के क्षेत्र में आते थे और बेहतरीन शोध करते थे. पर वही सब व्यक्ति अब साठ की उम्र तक आ चुके हैं. युवाओं का तो विज्ञान जगत में आना एकदम ठप्प सा हो रहा है. प्रधान मंत्री भी इन्ही सब बातों की तरफ इशारा कर रहे थे.

आप चंद्रयान मिशन का एक अहम् हिस्सा रहे हैं. भारत ने आखिर इस मिशन की सफलता से क्या हासिल किया?

चंद्रयान ने भारतीय विज्ञान की प्रतिष्ठा को दुनिया भर में फैलाया है. दुनिया के लगभग सभी अंतरिक्ष संस्थाओं ने उसके बाद भारत में रूचि ली है और हमारी तारीफ की है. इस बात को ख़ास तौर पर सराहा गया है कि इसरो और नासा ने मिलकर चाँद पर पानी के सुराग ढूंढ निकाले. मैं कहूँगा की अन्तराष्ट्रीय साझेदारी की मिसाल रहा है ये मिशन.

चंद्रयान-2 का क्या मिशन रहेगा?

चंद्रयान-2 के ज़रिये हम चाँद पर किसी को भेज सकते हैं जो की वहां की ज़मीन पर मौजूद तरह-तरह के नमूने हम तक पहुंचाएगा.

चीन ने भी चन्द्रमा पर एक मिशन भेजा है और भारत ने भी. इन मिशनों की लागत पर तरह तरह के कयास लगते रहे हैं. आखिर किसका मिशन ज्यादा किफ़ायती था, भारत का या चीन का ?

मेरे ख़्याल से भारतीय मिशन इस मामले में दुनिया के सभी अभियानों से सस्ता ही रहा है. अगर हमने 80 मिलियन डालर के भीतर ही ये उपलब्धि हासिल कर ली तो मैं इसका श्रेय भारतीय वैज्ञानिकों को ही दूंगा. रहा सवाल चीन के चन्द्रमा मिशन का, तो पहली बात तो उन्हें हमारी तरह के परिणाम नहीं मिल सके. चन्द्रमा के बाद अब मंगल पर मिशन भेजने की बात कही जा रही है? मेरे हिसाब से मंगल तक का मिशन न्यायसंगत है क्योंकि आखिरकार सबसे बड़ा उद्देश्य तो किसी और गृह पर मानव सभ्यता को बसाने का है.चन्द्रमा के वातावरण को ध्यान में रखते हुए ये उचित नहीं होगा इसीलिए हो सकता है कि मंगल इस कार्य के लिए ज्यादा उचित साबित हो. मंगल पर खोज अब बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है.

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