तो क्या किस्मत फिर देगी सोरेन का साथ...

Shibu Soren
रांची। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के अध्यक्ष शिबू सोरेन इस उम्मीद के साथ तीसरी बार प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे कि पिछले दो मौकों की तरह इस बार भी वह कहीं मुश्किलों में पड़कर अपनी गद्दी न गवां बैठे।

सोरेन पहली बार मार्च 2005 में राज्य के मुख्यमंत्री बने थे लेकिन 10 दिनों के भीतर ही उन्हें अपने पद से त्यागपत्र देना पड़ा क्योंकि बहुमत साबित करने के लिए वह आवश्यक संख्या बल का जुगाड़ नहीं कर सके थे, और न ही विधानसभा में इसे साबित कर सके।

इसके बाद वह 27 अगस्त, 2008 को दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। इस दफा तो वह विधानसभा के सदस्य भी नहीं थे। मुख्यमंत्री बने रहने के लिए छह महीने के भीतर उनका विधानसभा चुनाव जीतना संवैधानिक अनिवार्यता थी। उन्होंने तमाड़ विधानसभा का उपचुनाव भी लड़ा लेकिन हार गए।

सोरेन के पास 18 विधायक

इस बार उनके पास 18 विधायक हैं और उन्हें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), जनता दल (युनाइटेड), ऑल झारखण्ड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) और कुछ निर्दलीय विधायकों का समर्थन है। इसके आधार पर शनिवार को उन्होंने सरकार बनाने का दावा भी पेश कर दिया। वह 30 दिसम्बर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।

सोरेन के लिए परिस्थितियां भी पिछले बार की ही तरह है। वह फिलहाल लोकसभा के सदस्य हैं और संवैधानिक अनिवार्यता पूरी करने के लिए उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा का सदस्य बनना पड़ेगा।

केंद्र में भी नहीं चला सिक्‍का

किस्मत ने केंद्र सरकार में बतौर मंत्री भी उनका साथ नहीं दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में जब पहली बार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार बनी तब उन्हें मंत्री बनाया गया लेकिन वर्ष 1975 के चिरूडीह हत्याकांड में उनके खिलाफ वारंट जारी होने के बाद दो महीने के भीतर ही उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

अक्टूबर, 2004 में सोरेन को फिर से केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली लेकिन झारखण्ड का मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में उन्हें यह पद भी छोड़ना पड़ा। वह मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन 10 दिनों के भीतर ही उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी क्योंकि वह विधानसभा में बहुमत नहीं साबित कर पाए।

वर्ष 2006 में उन्हें फिर से केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया गया लेकिन अपने निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने व आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने के कारण सोरेन को एक बार फिर मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने को बाध्य होना पड़ा। बाद में उच्च अदालतों से उन्हें इन सभी मामलों में राहत मिली। बहरहाल, अभी भी उनके खिलाफ गिरिडीह जिला अदालत में हत्या का एक मामला चल रहा है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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