कोपेनहेगन में धुंधली होती आस

कोपेनहेगेन में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गुरुवार को दिल्ली से रवाना हो रहे हैं. मनमोहन जब सम्मेलन में होंगे तब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी जलवायु परिवर्तन पर किसी सहमति की आस लिए वहाँ शामिल होंगे. दोनों नेता गुरुवार को पहुंचने वाले हैं.
पर अभी तक की स्थितियों को देखकर अब किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी समझौते की उम्मीद कम ही नज़र आ रही है.हालांकि बुधवार को सम्मेलन में कुछ विकसित देशों ने जंगलों को बचाने के लिए 3.5 अरब डॉलर देने का एलान किया है. ब्रिटेन, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, नार्वे और फ़्रांस ने अगले तीन सालों में ये रकम नगद देने का वादा किया है.
माना जा रहा है कि दुनिया में हो रहे कार्बन उत्सर्जन का बीस प्रतिशत कटते हुए जंगलों की वजह से है.उम्मीद की जा रही है कि ये पैसा विकासशील देशों में जंगलों की कटाई को कम करने, रोकने और अंतत: नए पेड़ लगाने की प्रक्रिया को शुरू करने में सहायक होगा.
लेकिन ये मामला इस जलवायु सम्मेलन के कम पेचीदे मामलों में से है और इसके साथ भी कई शर्तें जुड़ी हुई हैं.ये पैसा दस अरब डॉलर के एक पैकेज का हिस्सा होगा जिसका जारी होना इस पर निर्भर करेगा कि कोई ठोस समझौता होता है या नहीं.
इसके अलावा बीबीसी संवाददाता मैट मैक्ग्रॉ का कहना है कि जंगलों की कटौती रोकने के लिए ये रकम ऊंट के मुंह में ज़ीरा की तरह है.हाल ही में जारी एक रिपोर्ट का कहना है कि अब से लेकर 2015 तक जंगलों की कटौती में 25 प्रतिशत की कमी लाने के लिए पच्चीस अरब डॉलर की ज़रूरत पड़ेगी.
वहीं जापान ने इसके अलावा ग़रीब देशों को अगले तीन सालों में पांच अरब डॉलर देने का वादा किया है बशर्ते चीन जैसे विकासशील देश एक बाध्यकारी समझौते के लिए तैयार हो जाएं.भारत की विदेश सचिव ने बुधवार को प्रधानमंत्री की यात्रा के बारे में बताते हुए कहा था कि भारत का रुख इस मुद्दे पर सकारात्मक है और भारत एक भेदभाव से परे, व्यापक और सभी के हित में होने वाले समझौते के लिए प्रतिबद्ध है.
इस तरह की घोषणाओं का कुछ देशों ने तो स्वागत किया है लेकिन वार्ताकार इसे विकासशील देशों के लिए एक मीठी गोली की तरह देख रहे हैं जिसके लालच में वो कोपेनहेगेन में किसी समझौते पर दस्तखत करने के लिए तैयार हो जाएं.भारत समेत कई देशों के वार्ताकार अब किसी बाध्यकारी समझौते की उम्मीद छोड़ते नज़र आ रहे हैं और इसी माहौल में आज दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्ष कोपेनहेगेन पहुंच रहे हैं.












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