शायद उम्मीद छोड़नी होगी: मून
कोपेनहेगन में चल रही जलवायु वार्ता अब काफ़ी अहम और नाज़ुक मोड़ में पहुँच गई है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने संकेत दिए हैं कि ग़रीब देशों को शायद अपनी ये उम्मीद फ़िलहाल छोड़नी होगी कि अमीर देश उन्हें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तुरंत पैसा देंगे.
विकासशील देश जिस धनराशि की माँग कर रहे हैं और पश्चिमी देश जो धनराशि देने के लिए तैयार हैं उसमें काफ़ी फ़र्क़ है और ये वार्ता के दौरान एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. बान की मून स्वंय कोपेनहेगन में हैं. उन्होंने फ़ाइनेंशियल टाइम्स से बातचीत में कहा कि उन्हें नहीं लगता कि इस कोष की सही-सही राशि इस समझौते के लिए अहम है.
उन्होंने सभी देशों से अनुरोध किया है कि सबके भले के लिए वे एक आम समझौते पर हस्ताक्षर कर दें. इस बीच कोपेनहेगन में सुरक्षा इंतज़ाम और कड़े कर दिए गए हैं. विभिन्न दलों के हज़ारों लोगों को अंदर जाने के लिए लंबी कतारों में लगना पड़ा.
मंत्री-स्तर की वार्ता शुरु होने से पहले ही डेनमार्क में अधिकारियों ने सम्मेलन स्थल के अंदर जाने वाले लोगों की संख्या पर पाबंदी लगा दी है.
विरोध प्रदर्शन
बीबीसी संवाददाता का कहना है कि कार्यकर्ता मार्च करने की योजना बना रहे हैं. ये लोग सम्मेलन स्थल के अंदर चैंबर में घुसने की कोशिश कर सकते हैं ताकि उन लोगों का साथ दे सकें जो सम्मेलन से वॉकआउट करने की योजना बना रहे हों.
क्लाइमेट जस्टिस एक्शन ग्रुप की प्रवक्ता ने बताया कि बुधवार को सविनय अवज्ञा की तर्ज़ पर प्रदर्शन होंगे. वहीं अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उम्मीद जताई है कि कोई समझौता हो पाएगा. वे इस हफ़्ते कोपेनहेगन आएँगे.
इससे पहले भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने आशंका जताई थी कि जलवायु परिवर्तन पर दुनिया भर के देशों के साथ कोई आम सहमति शायद ही बन पाए. उनका कहना था कि सदस्य देशों के बीच चल रही बातचीत में स्पष्टता की कमी है. अभी इसी मुद्दे पर विवाद चल रहा है कि कौन ग्रीनहाउस गैसों में कटौती करे और कितनी करे.












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