कोपेनहेगन सम्मेलन में दूर नहीं हो पा रहा है गतिरोध (राउंडअप)
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह गुरुवार को कोपेनहेगन के लिए रवाना होंगे। इससे पूर्व भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि विकसित देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जो मात्रा बातचीत की मेज पर प्रस्तुत की गई है, वह निराशाजनक है।
कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन में पैदा हुए गतिरोध से उबरने की कोशिशों के बीच समझौते का एक नया मसौदा जल्द ही प्रस्तुत किया जा सकता है। यह प्रस्ताव ऐसे समय में आने वाला है, जब चीनी प्रतिनिधिमंडल ने पारदर्शिता के अभाव की शिकायत की है।
बुधवार को चली वार्ता में डेनमार्क के प्रधानमंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन ने शिकायती लहजे में कहा, "दुनिया उम्मीद रखती है कि हम आगे बढ़ें और हम हैं कि प्रक्रिया, प्रक्रिया और प्रक्रिया पर ही बात कर रहे हैं।" इस पर चीन के मुख्य वार्ताकार वी सू ने कहा, "यह प्रक्रिया का मामला नहीं है, यह एक बुनियादी मामला है।"
आयोजकों को उस समय एक बयान देने को मजबूर होना पड़ा, जब कुछ मीडिया समूहों ने खबर दी कि सम्मेलन की अध्यक्ष कोन्नी हेडेगार्ड ने इस्तीफा दे दिया है।
दूसरी ओर लगभग 192 देशों के वार्ताकार गतिरोध को दूर करने की कोशिश में लगे रहे। ब्रिटेन, जर्मनी और चार अन्य यूरोपीय देशों सहित 25 देशों वाला प्रतिबंधित समूह (रेस्ट्रिक्टेड ग्रुप) गतिरोध को दूर करने के तरीकों पर चर्चा करने वाला था।
जर्मनी के पर्यावरण मंत्री नोबर्ट रोइटजेन ने कहा कि डेनमार्क की अध्यक्षता वाले सम्मेलन और जी-77 के बीच अब भी मुख्य विवाद बना हुआ है। जी-77 में भारत और चीन जैसे बड़े देशों के अलावा छोटे अफ्रीकी देश भी शामिल हैं।
दिन में दुनिया के 30 से अधिक नेता सम्मेलन को संबोधित करने वाले थे। डेनमार्क के प्रधानमंत्री अंद्रेस लोके रासमुसेन को पर्यावरण मंत्रियों के बीच वार्ता कराने का जिम्मा सौंपा गया था। जबकि सम्मेलन की अध्यक्ष कोन्नी हेडेगार्ड को अनौपचारिक बातचीत करनी थी।
कोपेनहेगन में मौजूद राजनयिकों ने उस रिपोर्ट को खारिज किया है जिसमें कहा गया था कि नए समझौते के प्रारूप को करीब 200 प्रतिनिधियों के बीच बांटा गया है।
सूत्रों के मुताबिक गतिरोध को खत्म करने के लिए यूरोपीय संघ ग्रीन हाऊस गैसों में उत्सर्जन में कटौती की सीमा 20 फीसदी से बढ़ाकर 25 फीसदी करने की घोषणा कर सकता है।
यद्यपि वार्ता शुरू होने से पहले यूरोपीय संघ ने कहा था कि यदि ग्रीनहाऊस गैसों का सबसे ज्यादा उत्पादन करने वाले देश कटौती की घोषणा करते हैं तो वह उत्सर्जन में 30 फीसदी तक की कटौती की घोषणा कर सकता है।
तवालू द्वीप के डूबने का खतरा :
प्रशांत महासागर में स्थित एक छोटे-से द्वीपीय देश तवालू ने बातचीत में प्रगति के अभाव का आरोप लगाया है। ग्लोबल वार्मिग के कारण समुद्र के जलस्तर में हो रही बढ़ोतरी के चलते तवालू के डूबने का खतरा पैदा हो गया है।
जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र में पानी के स्तर में वृद्धि के कारण अपने द्वीप के डूबने का खतरा झेल रहे तुवालु द्वीप के एक प्रतिनिधि ने कहा, "वार्ता की स्थिति से हम बहुत निराश हुए हैं।" उन्होंने कहा, "हम टाइटैनिक पर सवार हैं और हमें डूबने का भय सता रहा है।"
250 प्रदर्शनकारी गिरफ्तार :
इस बीच डेनमार्क पुलिस ने सम्मेलन परिसर की ओर कूच कर रहे 170 प्रदर्शनकारियों को बुधवार को गिरफ्तार कर लिया। हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी सम्मेलन स्थल की ओर कूच कर रहे थे। 'क्लाइमेट जस्टिस एक्शन' नामक संगठन के कार्यकर्ताओं ने कहा है कि उनकी कोशिश अति सुरक्षित बेला सेंटर में घुसने की थी।
करीब 50 प्रदर्शनकारियों को एक शॉपिंग सेंटर के करीब से गिरफ्तार किया गया जबकि अन्य को एक रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार किया गया। प्रदर्शन की आशंका को देखते हुए पुलिस ने पहले ही बेला सेंटर परिसर के चारों ओर कंक्रीट के अवरोधक खड़े कर दिए थे। मंगलवार को पुलिस ने कई साइकिलों और व्यवधान उत्पन्न करने वाली चीजों को जब्त किया था।
डेनमार्क की पुलिस सप्ताहांत में होने वाले उस विरोध प्रदर्शन को लेकर चिंतित है, जिसमें 1,200 से अधिक प्रदर्शनकारी हिस्सा लेने वाले हैं।
पर्यावरण संकट हल करने में धन महत्वपूर्ण:
संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने कहा कि जलवायु परिवर्तन संकट हल करने में धन, खासकर गरीब देशों को वित्तीय मदद की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
कोपेनहेगन में 7-18 दिसम्बर के जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन के उच्च स्तरीय सत्र का शुभारंभ करते हुए मून ने अगले तीन वर्षो तक हर वर्ष गरीब देशों की मदद के लिए 10 अरब डॉलर का कोष जुटाने की धनी देशों की पहल का स्वागत किया। इस उच्च स्तरीय सत्र में करीब 120 देशों के राष्ट्राध्यक्ष हिस्सा लेंगे।
मून ने इसे एक अच्छी शुरुआत बताते हुए कहा कि सभी समस्याओं को हल करने के लिए गरीब देशों की दीर्घकालिक वित्तीय समस्याओं को सुलझाना आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) को इतिहास का निर्णायक क्षण करार देते हुए बान ने कहा, "हम यहां एक नया भविष्य बनाने आए हैं। जलवायु परिवर्तन वैश्विक कार्यसूची में शीर्ष पर है। हमें पता है कि हमें क्या करना चाहिए और दुनिया को हमसे क्या उम्मीदें हैं। अब हमारा काम समान हित में एक समझौता करना है।"
लंबे समय से जलवायु परिवर्तन को इस समय की निर्णायक चुनौती कहते आ रहे संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा, "जिन वैश्विक चुनौतियों का सामना हम कर रहे हैं उनमें कोई भी इतनी अधिक मूलभूत नहीं है।"
एक संवाददाता सम्मेलन में मून ने कहा, "हमें वर्ष 2010 में एक नई कानूनी रूप से बाध्य संधि के लिए समय सीमा तय करनी चाहिए। इस समय सीमा को लटकना नहीं चाहिए।"
विकसित और विकासशील देशों के बीच जारी कलह पर मून ने कहा कि हर नेता को घरेलू दबावों का सामना करना होता है लेकिन यदि हमने कदम नहीं उठाया तो हर नागरिक का हित दांव पर होगा।
मून ने कहा कि सौदेबाजी का समय बीत चुका है और सहमति का वक्त आ गया है। कोई वह सब कुछ नहीं हासिल कर सकता जो वह चाहता है लेकिन सभी एक साथ काम करेंगे तो हर किसी को वह हासिल होगा जिसकी उसे आवश्यकता है।
कोपेनहेगन में राष्ट्रीय हितों की रक्षा करेगा भारत :
प्रधानमंत्री के कोपेनहेगन के लिए रवाना होने से एक दिन पहले भारत की ओर से बुधवार को कहा गया है कि विकसित देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन में कटौती की जो संख्या बातचीत की मेज पर प्रस्तुत की गई है, वह निराशाजनक है। इसके साथ ही सरकार ने जलवायु सम्मेलन में एक व्यापक, प्रभावी और न्यायसंगत परिणाम की वकालत की है।
नई दिल्ली में विदेश सचिव निरूपमा राव ने जोर देकर कहा है कि भारत कोई अवरोध पैदा करने वाला देश नहीं है और वह कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर बातचीत में एक रचनात्मक भूमिका निभाएगा।
शमन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और वित्त संबंधी प्रमुख मुद्दों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच गहरी होती खाई के बीच राव ने यहां संवाददाताओं को बताया, "हम कोई अवरोध खड़ा करने वाले देश नहीं हैं। लेकिन यह भी है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा और उसके संरक्षण के प्रति अडिग बना रहेगा। विकासशील देश पूरी मजबूती के साथ हमारे पीछे खड़े हैं।"
प्रधानमंत्री की दो दिवसीय कोपेनहेगन यात्रा के दौरान राव और जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत श्याम सरन प्रधानमंत्री के साथ रहेंगे। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश पहले से वहां भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन पर भारत की स्थिति के बुनियादी सिद्धांतों को दोहराते हुए राव ने कहा कि भारत कोपेनहेगन में एक व्यापक सर्वमान्य परिणाम चाहता है और विकसित देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन में अधिक कटौती चाहता है।
राव ने एक सवाल के जवाब में कहा, "दुर्भाग्यवश बातचीत की मेज पर विकसित देशों द्वारा कार्बन उत्सर्जन कटौती की जो मात्रा प्रस्तुत की गई है, वह निराशाजनक है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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