बजाज नहीं बनाएगा स्कूटर

Bajaj Scooter
'हमारा कल हमारा आज, बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर'....कहने को तो ये एक स्कूटर कंपनी का विज्ञापन भर है लेकिन अस्सी और नब्बे का ये विज्ञापन उस समय के हिंदुस्तान की जीती-जागती तस्वीर पेश करता है.

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कुछ दिन पहले ऑटो कंपनी बजाज ने फ़ैसला किया है कि वो अब स्कूटर नहीं बनाएगा और मोटरसाइकल सेगमेंट पर ज़्यादा ध्यान देगा. आज के आधुनिक भारत में भले ही सड़कों पर चमचमाती कारें और सरपट दौड़ते मोटरसाइकल ज़्यादा नज़र आने लगे हों. लेकिन एक समय ऐसा था जब अस्सी और नब्बे के दशक में मध्यम वर्ग के घरों में स्कूटर को ही शान की सवारी समझा जाता था.

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दशकों तक स्कूटर भारतीय मध्यम वर्ग का बड़ा सपना रहा है. इन्हीं सपनों को संजोते टीवी पर बजाज ऑटो के 'हमारा बजाज" वाले विज्ञापन हज़ारों लोगों के दिल को छू गए थे. जो लोग अस्सी और नब्बे के दशक में बड़े हुए हैं वो शायद इस भाव को बेहतर समझ सकते हैं. ये विज्ञापन उस समय के भारत की तस्वीर दिखाते थे.

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उस दौर में शायद हर घर में स्कूटर से जुड़ी खट्टी-मीठी यादें रही होंगी. मेरे घर में जब बजाज चेतक आया तो उसे देखने और 'टेस्ट ड्राइव" करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी थी और मैं कई दिनों तक घरवालों से नाराज़ रही थी कि आख़िर स्कूटर पर सबसे पहला 'झूला" मुझे क्यों नहीं दिलाया गया.

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उस दौरान स्कूटर की बुकिंग के लिए महीनों का इंतज़ार करना पड़ता था. घर में स्कूटर क्या आया कि पूरी गली में उत्सव सा माहौल बन जाता था.

नैनो का सपना

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बजाज ऑटो द्वारा स्कटूर उत्पादन बंद करने का फ़ैसला केवल एक व्यवसायिक या बिज़नेस फ़ैसला नहीं है. ये भारतीय मध्यम वर्ग की बदलती आकांक्षाओं, इच्छाओं और सपनों को भी दर्शाता है. दिलों पर राज करने वाले ऐसे ही कई ब्रैंड भारतीय मनपटल से ओझल से होते नज़र आ रहे हैं- लूना, लिज्जत पापड़.. ऐसे कितने ही विज्ञापन ज़हन में आ रहे हैं.

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पर आज के बुलंद भारत की तस्वीर काफ़ी बदल गई है. ऐसा तो नहीं कह सकते कि स्कूटर भारतीय परिदृश्य से ग़ायब हो गया है या हो जाएगा.लेकिन ये भी सच है कि स्कूटर की जगह मोटरसाइकल युवाओं के दिल की धड़कन बन गए हैं तो मध्यम वर्ग के नैनों में लखटकिया नैनो बसने लगी है.

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स्कूटर की तरह हर घर में कार रखना अब मध्यम वर्ग के लिए कोई ऐसा सपना नहीं रहा जो उसकी पहुँच से बाहर है. ऐसे में बजाज स्कूटर का वो विज्ञापन (हमारा कल, हमारा आज, बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर हमारा बजाज)....सुनना ऐसा लगता है मानो आप धूल की परत हटाकर किसी पुरानी और अजीज़ किताब के पन्ने पलट रहे हों.

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ये बदलते रुझान वाकई बुलंद होते भारत के कल और आज की 'बुलंद' तस्वीर पेश करते हैं.(ये बहस का विषय ज़रूर है कि जब पूरे विश्व में जलवायु परिवर्तन को लेकर बहस छिड़ी हुई है तो ये बुलंदियाँ भारत को किस ओर ले जाती हैं)

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