मानव जीनोम मैपिंग के दावों पर वैज्ञानिकों ने उठाए सवाल
बेंगलुरू, 12 दिसम्बर (आईएएनएस)। भारतीय वैज्ञानिकों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि एक भारतीय के जीनोम की मैपिंग का सरकार का दावा अतिरंजित है।
परंपरा के अनुसार शोध को एक जर्नल में प्रकाशित करने के स्थान पर वैज्ञानिक और औद्योगिक शोध परिषद (सीएसआईआर) के संसद के माध्यम से शोध की घोषणा पर भी कई वैज्ञानिकों ने आश्चर्य जताया।
हैदराबाद में सेल्युलर एंड मालीक्युलर बॉयोलाजी (सीसीएमबी) की संस्थापक पुष्पा भार्गव ने आईएएनएस को टेलीफोन पर बताया, "इस तरह के बयानों से देश की वैज्ञानिक विश्वसनीयता प्रभावित होगी।"
उन्होंने कहा कि भारत के अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के समूह में शामिल होने के समाचारों से उनको आश्चर्य हुआ।
विज्ञान मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने संसद में एक बयान में कहा कि एक भारतीय का संपूर्ण जीनोम तैयार कर भारत ने एक अनोखी उपलब्धि हासिल की। उन्होंने कहा कि इस जीनोम पर आधारित दवाओं से आयु में 30 प्रतिशत की वृद्धि होगी।
सीएसआईआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी ने मंगलवार को एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि जीनोम निर्धारण से सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने और निरोधक दवाओं के विकास के साथ ही व्यक्ति आधारित दवाओं की खोज की संभावना बढ़ेगी।
वैज्ञानिकों का कहना है कि जीनोम तैयार करना बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है और यह अब वाणिज्यिक रूप से उपलब्ध है। कोई भी निर्धारित शुल्क देकर अपना जीनोम तैयार करवा सकता है। पहला मानव जीनोम सात वर्ष पहले तैयार किया गया था।
सैन फ्रांसिस्को की कंप्लीट जीनोम इंक ने इस वर्ष 14 मानव जीनोम तैयार किए हैं और इसके लिए प्रति व्यक्ति 5,000 डॉलर शुल्क लेती है। इसकी तुलना में सीएसआईआर ने एक जीनोम पर 30,000 डॉलर खर्च किए।
अपना नाम प्रकाशित कराने के अनिच्छुक भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू के एक वैज्ञानिक ने कहा कि इस संबंध में इंटरनेट पर तमाम विज्ञापन दिखाई देते हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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