कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन का रुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ओर (लीड-2)

कोपेनहेगन, 9 दिसम्बर (आईएएनएस)। उहापोह भरा एक दिन और घेरेबंदी की पूरी एक रात बीत जाने के बाद अब जलवायु परिवर्तन पर हो रहे शिखर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे 192 देशों में से अधिकांश देशों ने बुधवार को भारत और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं द्वारा जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव से दुनिया को बचाने के लिए तैयार किए गए मसौदे पर चर्चा शुरू कर दी है।

ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन द्वारा तैयार किया गया यह तथाकथित बीएएसआईसी मसौदा 3,500 विभिन्न वार्ताकारों और 12,000 से अधिक गैर सरकारी संगठनों के बीच अब चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।

जी-77 और चीन, जो कि जलवायु परिवर्तन पर आयोजित इस सम्मेलन में एक गुट के रूप में बातचीत कर रहे हैं, ने डेनमार्क द्वारा प्रस्तुत मसौदे पर सख्त रुख अपनाया है, क्योंकि उनका कहना है कि इसमें विकसित देशों को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में पर्याप्त कटौती के लिए बाध्य नहीं किया गया है, जबकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर नए तरह की जवाबदेही थोपी गई है।

विकसित और विकासशील देशों के बीच गहराए इस मतभेद के कारण बुधवार की सुबह बीएएसआईसी का यह मसौदा सम्मेलन के केंद्र में आ गया। इस मसौदे को भारत ने तैयार किया है। चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने बीजिंग में 27 नवंबर को आयोजित एक बैठक में इस मसौदे को अपनी मंजूरी दी थी। जी-77 और चीन इस मसौदे का सुबह से अध्ययन कर रहे हैं और भारतीय प्रतिनिधिमंडल के नेता श्याम सरन को उम्मीद है कि इस समूह द्वारा मंजूरी दे दिए जाने के बाद औपचारिक रूप से इसे यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के सचिवालय को प्रस्तुत कर दिया जाएगा।

यदि सभी देशों ने इसे अपनी सहमति दे दी तो यह मसौदा पूरी तरह पुष्ट हो जाएगा और कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन का घोषणा पत्र बन जाएगा।

वार्ताकारों ने स्वीकार किया है कि इस मसौदे के पुष्ट होने की जरूरत है। एक भारतीय प्रतिनिधि ने कहा है, "डेनमार्क के मसौदे की प्रतिक्रिया स्वरूप इसे जल्दबाजी में तैयार किया गया है। इसमें कई सारे महत्वपूर्ण आंकड़े शामिल नहीं हैं।"

लेकिन श्याम सरन ने कहा है, "बीएएसआईसी के मसौदे ने विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में जिम्मेदारियों को लेकर व्याप्त बुनियादी मतभेदों को दूर कर दिया है।"

दूसरी ओर डेनमार्क के मसौदे में वे सभी बातें शामिल की गई हैं जिन पर दो वर्षो से बात चल रही थी। लगभग सभी विकासशील देश इस मसौदे खिलाफ एकजुट हो गए हैं।

इस मसौदे की निंदा करते हुए संयुक्त राष्ट्र में सूडान के राजदूत लुमुंबा स्टैनिसलॉ डी-एपिंग ने यहां मंगलवार की शाम कहा, "डेनमार्क का मसौदा यूएनएफसीसीसी और क्योटो प्रोटोकॉल दोनों को खत्म करने वाला है। यह विकासशील देशों पर नई बाध्यता थोपता है।" सूडान भी उन 77 देशों के समूह में चला गया है, जिसमें लगभग सभी विकासशील देश शामिल हैं।

भारत ने भी डेनमार्क के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है। इसमें विकासशील देशों के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन की कटौती की समय सीमा का उल्लेख है। भारत की ओर से कहा है कि अगर इस ओर जोर दिया गया तो वह और अन्य विकासशील देश इस सम्मेलन से बाहर हो जाएंगे।

भारतीय प्रतिनिधिमंडल के एक अधिकारी ने आईएएनएस से कहा कि इस मसौदे की प्रतिलिपि भारत सहित कुछ ही देशों को प्रदान की गई जो कि एक बड़ा असामान्य-सा कदम है।

भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका डेनिश मसौदे का खुलकर विरोध कर रहे हैं। इनका कहना है कि इससे उनके विकास में अत्यधिक बाधा पैदा होगी।

उधर, डेनमार्क के पर्यावरण मंत्री काने हेडेगार्ड ने सोमवार को कहा था कि यह मसौदा नहीं, बल्कि चर्चा से जुड़ा एक पत्र था, जिसे वापस ले लिया गया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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