मानस और गीता का सत्संग करते हैं यासीन

लखनऊ, 25 नवंबर (आईएएनएस)। धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर मोहम्मद यासीन (60 वर्ष) गेरुए वस्त्र धारण कर, माथे पर तिलक लगा, गले में रुद्राक्ष माला पहनकर विभिन्न मंदिरों में पिछले करीब 40 वर्षो से घूम-घूमकर विभिन्न स्थानों पर रामचरितमानस और गीता का सत्संग कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के पिपराइच निवासी यासीन के मुताबिक इन पवित्र ग्रंथों में सीखने के लिए बहुत कुछ है, खासकर गीता और रामचरितमानस में मनुष्य के व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक आचरण का उल्लेख है।

यासीन हर सच्चे मुसलमान की तरह पांचों वक्त की नमाज अदा करते हैं। इन ग्रंथों के प्रति यासीन का झुकाव एक आकस्मिक दुर्घटना के कारण हुआ। जब वह 17 वर्ष के थे तो एक सड़के हादसे में उनके पिता मोहम्मद सलीम की मौत हो गई।

यासीन पिता को सबसे अधिक प्यार करते थे। उनकी पढ़ाई भी छूट गई। वह एकांत में रहने लगे और खुद को एक कमरे में बंद कर लिया। धीरे-धीरे वह बीमार पड़ गये और उनको अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अस्पताल में उनकी मुलाकात एक साधु से हुई। साधु उनको रामायण की कहानियां सुनाते और यासीन से उनके मजहब और कुरान के बारे में पूछते।

गीता और रामायण की रोचक कथाओं को सुनने में यासीन की दिलचस्पी बढ़ने लगी। साधु ने यासीन को धर्मग्रंथों का ज्ञान हासिल करने के लिए प्रवचन सुनने के सलाह दी। पहले यासीन ने छुपकर प्रवचन सुनना शुरू किया। इसके बाद उन्होंने सत्संग और प्रवचनों में नियिमत रूप से हिस्सा लेना और ग्रंथों को पढ़ना शुरू कर दिया। यासीन के घरवालों और रिश्तेदारों को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने उसके सामाजिक बहिष्कार की धमकी दी।

धमकियों से नहीं डरने पर आखिरकार यासीन को घर से निकाल दिया गया। घर से निकलने के बाद यासीन ने मंदिरों में सत्संग और रामचरितमानस पर छोटे-छोटे प्रवचन करना शुरू कर दिया।

आजकल यासीन अपना अधिकांश समय प्रवचन देने में बिताते हैं। उनका बेटा गफूर कपड़े का पुश्तैनी व्यापार संभालता है।

स्थानीय हिंदू यासीन को संत यासीन भारती के नाम से बुलाते हैं। एक स्थानीय व्यक्ति बंशराज मिश्र ने आईएएनएस को बताया कि वास्तव में वह कौमी एकता की मिसाल बन गए हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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