दिल्ली के निराश्रितों को रात काटने के लिए एक अदद छत व कंबल की दरकार

हालांकि इनमें से कुछ लोग रात्रिकालीन सरायों में समय पर पहुंच कर वहां अपने लिए कोई एक कोना सुरक्षित करा लेते हैं, लेकिन इनमें से कई सारे लोग एक कंबल के लिए तरसते हुए ठंड से संघर्ष करते रहते हैं।

तीन साल पहले लखनऊ के पास एक छोटे कस्बे से चल कर काम की तलाश में दिल्ली आए अशरफ रिक्शा चलाते हैं। अशरफ ने दिल्ली सरकार द्वारा निजामुद्दीन इलाके में बनाए गए एक बसेरे में एक कोना सुनिश्चित करा लिया है। इस बसेरे का प्रबंधन एक्शनएड के सहयोग से एक गैर सरकारी संगठन आश्रय अधिकार अभियान (एएए) करता है।

अशरफ बताते हैं, "जिस तरह से तापमान नीचे गिर रहा है, मुझे नहीं पता कि भाग्य कब तक मेरा साथ देगा। बसेरे में पनाह चाहने वालों की बहुत भीड़ है। पिछले वर्ष सर्दी की आधी रातें मैंने आसमान के नीचे एक कंबल में ही काट दी थी।"

इसी बसेरे में एक कंबल में लिपटी थकी आंखों वाली सुशीला लकड़ी के एक पटरे पर बैठी हुई थी। वही उसका बिस्तर था।

शारीरिक रूप से अपंग 35 वर्षीय विधवा सुशीला ने कहा, "मैं यहां पिछले पांच दिनों से हूं और एक बेहतर जगह व कंबल पाने की कोशिश में लगी हुई हूं।"

वह कहती हैं, "मेरा नाम यहां दर्ज है। मैं यहां अक्सर रहती हूं। इसलिए बाद में भी यहां जगह पाने में मुझे कोई दिक्कत नहीं होने वाली।"

वहां उपस्थित दर्जनों बच्चों व विभिन्न उम्र की लगभग 30 महिलाओं की ओर वह नजर दौड़ाती हैं। वह हल्का-सा मुस्कराती हैं और कहती हैं, "यहां मैं अकेले नहीं हूं। ये सब लोग मेरे परिवारजन बन गए हैं।"

सुशीला की तरह यहां तमाम ऐसे निराश्रित हैं जो एक-एक दिन काटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

राजधानी में निराश्रितों के लिए कुल 27 बसेरे हैं। इनमें से 17 स्थायी हैं। बाकी अन्य बसेरों को ठंड के मौसम में स्कूलों व सामुदायिक केंद्रों में अस्थायी रूप से बनाया जाता है। इस लिहाज से ज्यादा जरूरतमंद 13 इलाकों में 20 तंबू भी खड़े किए गए हैं।

लेकिन बसेरों की यह संख्या दिल्ली में 200,000 निराश्रितों को शरण दे पाने में नाकाफी है। स्थिति तब गंभीर हो जाती है, जब तापमान पांच डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है, जैसा कि नववर्ष की पहली रात को हुआ था।

एक्शनएड में एएए के कामकाज की प्रमुख परमजीत कौर ने आईएएनएस को बताया, "वर्ष 2000 से दिल्ली में निराश्रितों की संख्या दोगुनी हो गई है, जबकि बसेरों की संख्या में मामूली वृद्धि ही हो पाई है।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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